गांव
का माहौल, गर्मियों के दिन, फुरसत के क्षण, काम ज्यादा कुछ नहीं, बस आराम ही आराम। अलग अलग व्यंजनों के
स्वाद के बीच मिलते ये कुछ दिन, कैसे निकल जाते है, पता ही नहीं चलता है। रात में सबका मनोरंजन, खुली छत में सोना, देर तक बाते करना, एक दूसरे पर व्यंग्य कर सबका मनोरंजन
करना, हंसी ठंहाके के दिन....बड़े याद आते
है।
चोकलेट चोरी की इस
बात को ज्यादा समय नहीं हुआ है। जून की छुट्टियों फुल फैमेली शामिल थी.....दोपहर
का समय था...उस समय माहौल एक दम शांत सा था.....पता नहीं पर क्यूं....पर सब शांत
स्वर में बातें कर रहे थे। तभी मेरे बडे़ भाई दिप्तेश के खुरापाती दिमाग में अचानक
बात आयी कि....क्यू ना फ्रिज में जिनल के लिए आयी चाॅकलेट हम सब मिलकर खा लें। तभी
जिनल बोली, नहीं वो कोई नहीं खाएगा....मैं भी
नहीं....पानी तो सबके मुंह में आ रहा था...ओर जिनल के भी...तभी सब मुझसे पूछने लगे
तो क्या किया जाए, मैंने कहा कि चार में से दो छोटी चाॅकलेट तो खा ही सकते है। तो
जिनल ने भी हामी भर ही दी।
अब बात थी कि फ्रिज तक जायें कौन ? पहले भावेश को भेजा गया लेकिन बैरंग
लौट गया सभी मायूस हो गए,,,,,, दो बार के प्रयास के बाद अन्ततः मूझे ही जाना
पड़ा..... स्वाद तो खूब लिया चाॅकलेट का पर सभी की नजर और दो बची चोकलेट पर
थी.....खानी तो सबको थी पर बोले कोन ये बड़ा सवाल था, सभी के मन में जिज्ञासा थी
की कोई तो बोलेगा।
थोड़ी देर बाद फिर खुरापाती दिमाग वाला बंदा बोला....बडी चाॅकलेट मे से जिनल
वाली चाॅकलेट सपाट कर देते है। मैंने कहा जिनल नहीं खाएगी तो क्या हुआ हम तो खा ही
सकते है...तो वो बोली मैं भी खाउगी। इस पर सब हँसे पर थोड़ा सा, पर शर्त रखी कि
किसी को कानोंकान खबर नहीं चलनी चाहिए। बाकि एक रही चाॅकलेट भी जिनल को नहीं मिली
का बहाना बनाकर खा लेंगे। बडी सावधानी से दूसरे खेमों के विरोधी मित्र के बीच से
गुजरते हुए बड़ी वाली चाॅकलेट चुरा ली....उसके बाईट को अवा में बैठे सभी को बराबर
हिस्से में बांटा गया.....सबने खा ली...
अब
शाम ढ़लने को थी...क्योंकि आप सब सोच रहे होगे कि चाॅकलेट फ्रिज में पड़ी है, चोरी करने की जरूरत क्यूं पडी...क्यूंकि
वो चाॅकलेट कहे तो ओनली फॉर जिनल के लिए थी...वो सामने वाली टीम की चोक्लाते
प्रणाली से बहुत नाराज थी...वो इतनी कि गुस्सा नाक पर,,, मुह फुला सा वो उनसे बात
तक नहीं कर रही थी....20
घंटे बाद भी किसी ने उस चोकलेट को छुआ तक नही था...बडी आश्चर्य की बात थी।
शाम
के चाॅकलेट के चहेते को बर्फ की जरूरत पड़ गयी तो उसने फ्रिजर खोला तो पैरों तले
जमीन खिसक गई कि मात्र एक चाॅकलेट बची है वो भी जिनल वाली.....पूरी टीम जिसमें
दिव्या, कर्तव्य, स्वीटी, स्मिथ
वो लग गए कि चाॅकलेट गयी तो गयी कहा....इधर उधर, घर के कोने कोने में हर शक्स से पूछताछ की पर कोई जवाब नहीं मिला।
पूरी टीम घर के दूसरे हिस्से में इस बातों को भूला अन्य बातों में मशगूल हो गए।
पर
बिल्कुल सही कहा गया है कि चोर चोरी करने के बाद कोई न कोई सूराग छोड ही देता है, हमने भी एक सुराग उनकी जांच पड़ताल के
लिए छोड़ दिया। हमारे समूह की सावधानी में कहने को छोटा लेकिन बडा सबूत छोड़ दिया।
जिसको किसी को अंदाजा तक नहीं था...ये गलती इतनी भारी पड़ सकती है कि हमारी दूसरी
चाॅकलेट खाने के सपने पर भी पानी फिर सकता है...इसमें मेरी बुआ और दीदी ने भी पूरा
साथ दिया....
तभी सीआईडी आॅफिसर दिव्या की नजर एक सफेद कागज के टूकडें़ पर गई। जहां चिटियों का जमघट लगा था।
उसने
कागज को उठा देखा तो जोर से बोली.....ये तो चाॅकलेट का कागज है। फिर टीम ने
डस्टबिन जो अनुप्रयोगी वस्तुए रखने के लिए होता है। उसकी जांच की
तो मामला साफ हो गया। उन्हें पता चल गया कि खायी तो सभी ने मिलकर पर किस किस ने खायी
है...ये पता नहीं था। तभी उसी समूह में दिप्तेश भी बैठा था ओर वह हंस पड़ा। चोरी
की गैंग के एक सदस्य का तो पता लगाया। उस टीम ने उस सदस्य को साथ लेकर सब को
पकड़वा दिया। पता लग गया तो हंसी ठहाके बहुत लगे। सजा के तौर पर जज का फैसला हुआ
कि चाॅकलेट विरोधियो को मिलेगी....बस हम देखते रह गए। ............पर बडा मजा आया।
जिनल के चेहरे पर मुस्कान भी आ ही गयी.......सिद्धार्थ शाह
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