लोकतंत्र के उत्सव में किन्नरों को मिला तोहफा
सिद्धार्थ शाह
देर से सही, अपने अधिकार के लिए जुझते किन्नरों को आखिरकार
पहचान के रूप में अपना हक मिल गया। किन्नरों ने अस्तित्व की एक लम्बी लडाई लडी।
किन्नरों का अभी से नहीं, प्राचीनकाल से भारतीय
सभ्यता एवं संस्कृति से गहरा वास्ता रहा। एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने मामला
सुनाकर देश समेत विश्व के लिए सराहनीय कार्य किया है।
वैसे तो किन्नरों को विश्व के कुछ देश में पहले से ही तीसरे लिंग के रूप में
दर्जा प्राप्त हो चुका है। कुछ विकसित कहे जाने वाले देश में किन्नर अब भी इस
अधिकार से वंचित है। भारतीय समाज में जब जेंडर की बात होती है तो स्त्री एवं पुरूष
की चर्चा होती थी। लेकिन अब दरकिनार कर रहे किन्नर की भी चर्चा होगी। देखा जाए तो, अस्तित्व के लिए लगातार प्रयत्नशील रहे। अब थर्ड जेंडर के रूप में किन्नरों की
अपनी पहचान बन गई है।
वर्ष 2013-14 कई मायनों में महत्वपूर्ण रहा, हम बात करें राजनीति, सामाजिक समस्याओं, अपराधीकरण के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कडे फैसले सुनाएं। इसी वर्ष राजनीतिक
क्षितिज पर आम आदमी पार्टी का उदय भी हुआ। राजनीति में अपराधीकरण को रोकने के लिए
सुप्रीम कोर्ट के फैसलें को सराहा गया। गैर कानूनी सतरोल खाप पंचायत भी परम्परागत
बंधनों से हटकर ऊपर उठी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा किन्नरों को दी गई पहचान ऐतिहासिक
कार्य है।
किन्नर नेता लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 15 अप्रेल 2014 को यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने यह साफ
कर दिया है कि थर्ड जेंडर का फैसला सिर्फ किन्नरों के लिए है। कोर्ट ने शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने आदेश दिए है। इस फैसले से किन्नरों में वाकई
खुशी है। अब उन्हें भी अपनी जिंदगी को खुलकर जीने की मान्यता मिल गई है। भारतीय
समाज का हिस्सा बनना किन्नरों के लिए गर्व की बात है। सुप्रीम कोर्ट ने किन्नरों
को सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछडे रूप से देखे जाने के लिए सरकार को कहा है।
सरकारी आवेदन पत्रों में भी तीसरा कॉलम अब इनके लिए होगा। इसके साथ ही रोजगार के
क्षेत्र में इनकी राह खूल जाएगी। बच्चे गोद लेने का अधिकार मिल गया है।
अर्से से उपेक्षित किन्नर वर्ग-
भारत को आजादी मिले आज 67 वर्ष हो गए। लेकिन देख जाए
तो उन्हें यह आजादी अब नसीब हुई है। लम्बे समय से किन्नरों की समाज में उपेक्षा हो
रही थी। जिस मानवाधिकार एवं समानता के अधिकार की बात भारत में होती है। उनमें
किन्नरों के साथ भेदभाव हो रहा था। शादी समारोह में दुल्हा-दुल्हन पक्ष से
आशीर्वाद के नाम पर मिलने वाली राशि से अपना गुजारा कर रहे है। कुछ तो अपने मजबूरी
के चलते गलत कार्यो केे दल-दल में फंस गए। अक्सर भारतीय रेल्वे की बोगियों में यह
वर्ग अपने भरण पोषण के लिए दिख जाता है। अब सरकार को गंभीरता से इस बात पर विचार
कर इन सबसे निकालना होगा। तभी धरातल पर असली पहचान मिल पाएगी। आज भी सडक पर उनके
निकलते ही लोग एक टकी लगाकर देखते रहे। गांव हो या शहर, मोहल्ले में उनका न तो परिवार रहता है। ऐसे में उनको धरातल पर मजबूती मिलना
आसान नहीं होगा। स्त्री एवं पुरूष के समाज को किन्नरों को जागरूक होकर अपनाना
होगा।
लोकतंत्र के उत्सव में मिली खुशी-
इस समय देश में लोकतंत्र के उत्सव में डूबा है, उसी समय इन्हें अपनी पहचान रूपी तोहफा मिला। जानकारी के अनुसार देश में करीब
किन्नर 28 हजार के आसपास मतदाता है। देश की सरकार को चुनने
एवं लोकतंत्र को मजबूत बनाने में इनका भी योगदान है। थर्ड जेंडर के बाद इनकी आबादी
में मतदान योग्य भी अपने अधिकार के लिए आगे आएगे। इनकी आबादी में जो मतदाता मतदान
करने पीछे रहते है, अब वह भी आगे आएगें।
यहां मिल चुका अधिकार-
विश्व में पाकिस्तान, बांग्लादेश, आस्ट्रेलिया, नेपाल, न्यूजीलैंड के बाद भारत भी तीसरे जेंडर की सूची में शामिल हो गया है। किन्नरों
के अधिकारों की शुूरूआत में सबसे पहले कदम नेपाल ने उठाया था। भारत से अलग हुए देश
पाकिस्तान एवं बांग्लादेश ने किन्नरों को मान्यता पहले ही दे दी है। बात की जाए
विकसित देशों की तो वहां अभी यह बहस का मुद्दा बना हुआ है। अमेरिेका जैसे देश में
किन्नर अब अपने हक के लिए आगे आ रहे है। एक हिन्दी समाचार पत्र से मिली जानकारी के
अनुसार देश में किन्नरों की आबादी 30 लाख है। इसमें करीब 28 हजार के आसपास मतदाता है। भारत देश में किन्नरों की जो आबादी है, उसी के बराबर विश्व के कुछ देश है। ऐसे में उनका हक, अधिकार जायज था। क्यूंकि वे भी भारतीय समाज, सभ्यता एवं संस्कृति का हिस्सा है। सयुक्त राष्ट्र संघ ने इस फैसले की भूरी
भूरी प्रशंसा की है।
धरातल पर मजबूती के लिए संघर्ष-
विकास में सबसे पहले शिक्षा की जरूरत है। शिक्षा के बिना मानव समाज का विकास
नहीं है। शैक्षिक पिछडापन हमें हर क्षेत्र में पिछडा कर देता है। किन्नरों को अधिक
से अधिक शिक्षा से जोडने के लिए शिक्षा नीति बनानी होगी। शिक्षा नीति से विकास की
राह से जुड पाएंगें। किन्नरों के अपने इस रूप में उनका क्या दोष है। लेकिन किसी भी
योजना को मूर्त रूप लेने में लम्बा समय लग जाता है। वैसे इन्हें भी संघर्ष की
लम्बी राह से ही बदलाव हो पाएगा। भारत में हम यदि परिवर्तन की बात करें तो एकाएक
कुछ भी नहीं होता है। इन सबके लिए लम्बा समय लग जाता है। वैसे किन्नरों को अपने हक
के लिए जागरूक होना होगा। अपने हक के लिए आगे आना होगा।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा थर्ड जेंडर किन्नरों के लिए उठाया गया कदम मानवीय इतिहास
का शुभ संकेत है। अब ये भी सम्मान, गर्व की जिंदगी जीने एक
अच्छी शुरूआत कर पांएगे। अब इनकी भी उम्मीदें होगी। लेकिन सबसे बडी बात यह है कि
सरकार को गंभीरतापूर्वक इनके लिए एक ऐसी समिति बनानी होगी जो पूर्ण रूप से एक
निश्चित समय के लिए मजबूती प्रदान करने के कार्य में लगे रहे।
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