राजनीति की टेढ़ी मेढ़ी गलियां
राजनीति की गलियां
टेढ़ी मेढ़ी है, इसमें कोई संदेह
नहीं है। जो इन गलियों में घुस जाता है, वह बाहर निकलने का नाम नहीं लेता है, और जो इन ऊबड़ खाबड़ राह पर नहीं चल पाता है वह धीरे धीरे किनारा कर लेता है।
अब तो फिल्मी
कलाकारों को भी राजनीति रास आ रही है। यह अलग बात है कि उनकी राजनीति से जुडी
पृष्ठभूमि क्या रही हो। बात हो राजनीति व फिल्मनीति की तो दोनो के नामों में थोडा
सा फर्क नजर आता है। लेकिन काम के बारे में बडा अंतर है। अभिनेता अभिनेत्री को जो
प्रसिद्धि फिल्मी कैरियर में मिलती है, शायद ही उन्हें राजनीति में मिल पाए। राजनीति की टेढी मेढी गलियों में घुसने
का आसान रास्ता अब तो फिल्मी दूनिया से होकर ही गुजरता है। भले ही इनकी नाव एक बार
डूब जाए लेकिन तैर कर राजनीति की उन गलियों में मुकाम हासिल किया जा सकता है।
बाॅलीवुड के अच्छे खासे के नाम के कारण हर मतदाता कलाकारों को जानता है। ऐसे में
कलाकारों का राजनीति में पदार्पण जनता को अपनी ओर स्वतः आकर्षित करता है। 16वीं लोकसभा के चुनाव में दोनों प्रमुख
पार्टियों के साथ फिलहाल उभरी आम आदमी पार्टी ने राजनीति में फिल्मनीति का दांव
अच्छी तरह से खेला है। इस लोकसभा चुनाव में ऐसी सीटें जहां अभिनत्री बनाम
अभिनेत्री, नेता बनाम अभिनेता,
नेता बनाम अभिनेत्री की चुनौती रही। आज से नहीं
स्कूल के दिनों से सूनते आ रहे है कि राजनीति गंदी होती है। किचड एवं दलदल है।
उसमें नहीं जाना चाहिए। लेेकिन यह बात सही नहीं है। जनता को आगे आकर इसकी सफाई
करनी होगी। एक राजनेता जो जनता के बीच कार्यकर्ता होने से एक शीर्ष कडी तक पहुंचता
है, वहीं एक फिल्मी कलाकार को
ग्लैमर की आड में पार्टिया अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए प्रत्याशी बना दिया
जाता है। इस चुनाव में भी कुछ ऐसा ही हुआ। फिल्मी कलाकारों को राजनीति का ऐसा
चस्का लगा है, पूछो ही मत। ये
सब तो जनता के हाथ में है। इनका भाग्य ईवीएम में बंद हो चुका है। फिल्मी कलाकारों
ने टीवी पर अपनी कला दिखाई जनता इन्हें व्यक्तिगत रूप से पसंद करती है। ऐसे में
इसका भरपूर फायदा मिलता है। कलाकारों को देशहित, समाजहित के कार्य में आगे आकर अपनी काबिलियत साबित करनी
होगी।
उत्तरप्रदेश,
गुजरात, बिहार, आन्ध्र्रप्रदेश,
पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, चंडीगढ एवं अन्य
कुछ राज्यों में अभिनेता अभिनेत्री ने राजनीति में पहली बार अपना दांव खेला। जनता
का राजनेताओं के विश्वास में थोडी कमी नजर आयी है। ऐसे में राजनैतिक दलों के पास
अपनी पार्टी को मजबूती दिलाने फिल्मी कलाकार ही नजर आते है। प्रत्याशी के चुनाव
प्रचार, रोड शो, सभा की बात हो हिट लिस्ट में बाॅलीवुड की
एन्ट्री जरूर दिखेगी। दलों को यह एक विकल्प के रूप में नजर आता है कि पासा बदलने
में यह हरसंभव मदद करेंगें।
आन्ध्रप्रदेश में
तेलगू देशम पार्टी का आधार तो फिल्म जगत ही रहा है। लखनऊ सीट से आम आदमी पार्टी से
जावेद जाफरी, चंडीगढ से गुल
पनाग, भारतीय जनता पार्टी से
हेमा मालिनी मथूरा से, किरण खेर चंडिगढ,
परेश रावल पूर्वी अहमदाबाद, स्मृति ईरानी अमेठी, विनोद खन्ना पंजाब की गुरूदासपुर सीट, बाॅलीवुड के शाॅटगन शत्रुघ्न सिन्हा बिहार की
पटना साहिब सीट से चुनाव लड रहे है, गत चुनाव में शेखर सुमन को यही से हराया था। कांग्रेस से राज बब्बर गाजियाबार
सीट, मेरठ से नगमा, मुंबई की उत्तर पश्चिमी सीट से सुनील दत्त पांच
बार जीतने के बाद अब बेटी प्रिया दत्त, निर्माता निर्देशक प्रकाश झा बिहार से, आइटम गर्ल राखी सावंत अपनी राष्ट्रीय आम पार्टी से, रालोद से जया प्रदा, उम्मीदवार खडे है। भोजपुरी फिल्मों में अभिनय करने वाले
चर्चित चेहरे मनोज तिवारी गत चुनाव में गोरखपुर उत्तरप्रदेश से हार गए थे, इस बार दिल्ली की उत्तर-पूर्व से खडे है।
जौनपुर से रविकिशन खडे है। जिन्हें जनता व्यक्तिगत रूप से पसंद करती है। महेश
मांजरेकर, बप्पी लहरी, बाबुल सुप्रियो भी अपना भाग्य आजमा रहे है। ऐसे
में राजनीतिक दलों ने इन पर अपना दांव खेलकर अपनी जीत सुनिश्चत करने के लिए ताल
ठोंकी है।
बात करें फिल्मी
पाटी की, असल जिंदगी में कला
दिखाने के लिए इनकी एक पार्टी भी बनी लेकिन राजनीति का ज्यादा स्वाद नहीं ले पायी।
फिल्मी दुनिया से राजनीति में प्रवेश करने वाले संभवतया देवानंद पहले व्यक्ति है।
इससे पहले की बात करें तो फिल्मी कलाकारों का राजनीति दलों से अच्छा तालमेल रहा।
आपातकाल के समय मामला गडबड हुआ। उस समय उनके पास एक निश्चित खाका नहीं होने से
तत्कालीन जनता दल को समर्थन देकर कांग्रेस पार्टी के प्रति अपने बाण छोडे थे,
लेकिन जनता दल के गिरने से नई पार्टी बनाने की
राह चुनी। नाम रखा नेशनल पार्टी। जिसका गठन सितम्बर 1979 में हुआ। राजनीति के बारे में बात करना जितना आसान है,
उतना ही काम करना कठिन। अभिनेता-नेता देवानंद
भी जब राजनीति की टेढी मेढी गलियों से रूबरू हुए, तो उनके जोश में कमी आयी। इस तरह इनकी पार्टी और इन्होंने
राजनीति को बायं बायं कर दिया।
राजनीति में दल
बनना और विलीन होना आम बात है, लेकिन बदलते समय
के साथ अभिनेता, राजनीति में रूचि
दिखा रहे है, देश के प्रमुख दल
कांग्रेस, भाजपा, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी, रालोद आदि। जनता का समर्थन हासिल हो जाता है। राजनेता की जो छवि जनता के बीच
बनी हुई है। कहीं आने वाले फिल्मी कलाकारों की भी यह छवि न बने इसके लिए कलाकारों
को सक्रियता दिखानी होगी। मजबूती के साथ काम करने से जनता में विश्वास कायम किया
जा सकता है।
देवानंद के अलावा
अभिनेता गोविंदा, राजेश खन्ना,
सजय दत्त, धर्मेन्द्र, बिग बी अमिताभ
बच्चन राजनीति में कुछ बदलाव करने की उम्मीद से आए पर राजनीति की टेढी मेढी गलियां
इन्हें रास नहीं आयी।
आम आदमी पार्टी
की मिलती लकीरें-
वर्तमान आम आदमी पार्टी की तरह इस पार्टी ने भी उस समय जनता का
अच्छा खासा समर्थन हासिल किया। जिससे उस समय प्रमुख दल कांग्रेस एवं जनता दल के
होश उड़ गए। लेकिन समय के साथ उनसे जुड़ंे लोग आम आदमी पार्टी की तरह निकलते चल
गए। जिस जोश के साथ फिल्मी पार्टी ने जमीं पर पैर रखे थे उसी की तरह आम आदमी
पार्टी ने चुनावों में अपना रूप दिखाया। 49 दिन की सरकार बनने के बाद इस्तीफे के साथ ही इसके फैन और फाॅलोअर में कमी
आंकी गई थी। जनता में निराशा का भाव भी झलका। इसकी वास्तविकता तो 16 वी लोकसभा के चुनाव परिणाम में दिख जाएगी। मैं
यहां आम आदमी पार्टी पर सवालिया निशान नहीं खडा कर रहा हूं। यह तो भविष्य ही
बताएगा। लेकिन इन बातों में सच्चाई है, इसे अंत कहे या शुरूआत?
अपवाद के रूप में
नेशनल पार्टी के कुछ नेताओं ने देश और समाज हित के बारे में सोचा लेकिन लोकतंत्र
के पवित्र मंदिर में उनका प्रदर्शन उम्दा नहीं रहा। वर्तमान में खडे विभिन्न
राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों ने जिस तरह की अमर्यादित भाषा का प्रयोग किया है,
ऐसे में न तो उनकी लोकतंत्र के प्रति आस्था दिख
रही है, ऐसे में उन्हें देशद्रोही
कहना कोई गलत नहीं होगा।
आने वाली 16 मई जिसमें महज चंद फासला है। उस दिन तस्वीर
साफ हो जाएगी कि कौन अभिनेता लोकतंत्र के पवित्र मंदिर संसद में अपना कदम रखेंगे।
कौन अभिनेता नेता बनेगा? संसद में जनता की
आवाज को उठाएगे या फिर मौन रहेंगे। चुनौतिया ढेरों होगी। यह सब तो भविष्य के गर्भ
में है, लेकिन बस अब परिणाम का
इंतजार........
-सिद्धार्थ शाह Dungarpur
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