जिंदगी के तीन साल...........निराशा से निकली एक उम्मीद

जिंदगी के तीन साल...........निराशा से निकली एक उम्मीद जिंदगी के तीन साल.......मानो कैसे बीत गए पता ही न चला... तन्हा जब, करने के लिए कुछ न बचा हो. आज दोपहर बाद , थोडा अकेलापन महसूस हो रहा था.. मेरे अख़बार पढने के काम से आज थोड़ी फुर्सत मिली तो कलम उठाई. सोचा बीते तीन सालों की यादों को कागज में सहेजू....यकायक में अपनी जिंदगी के पिछले हिस्से में चला गया...सोचने लगा की मेने ऐसा क्या किया जो उसे लिखू....निराशा ही हाथ लगी....मेने जिंदगी के इन पलों में, बहुत कुछ खोया इसका मुझे आज पछतावा हो रहा है...लाइफ का एक महत्वपूर्ण हिस्सा... फ़्लैश बेक.......................... बाकि बच्चों की तरह मेरा अध्यन्न भी सरकारी स्कूल में हुआ..तभी किसी टीचर ने सभी विद्यार्थियों से पूछते पूछते मुझसे पूछा की आगे क्या करना चाहते हो...मेने भी तनकर खड़े होकर वही जवाब दिया जो मेरे जेहन में था...इस समयावधि के बाद मुझे भी एहम फैसला करना था....परिवार को देखकर मेने वही फैसला किया, जो मेरे मन में था, ईट की भाति मजबूत......समय बीतता गया.... मेरे साथी अपनी मर्जी के मालिक थे..अलग अलग रास्तो पर निकल पड़े...आज नहीं तो कल निकलना ही था...उन साथियों में मेरा एक सबसे अच्छा दोस्त भी था.....(नाम बताऊ या नहीं....काफी सोच विचार के बाद)....नाम भी उसके काम के जैसा..स्वभाव से भी वैसा.....विश्वास. (उसका नाम) वो भी मुझ से यही कहता की तुझे करना क्या है...में जवाब नहीं दे पता और कहता की कुछ अलग करना है.... (गहरी सोच के बाद).....मेने अपने आप को संभाला...बीत गया सो बीत गया अब आगे पूरा जहां पड़ा. इन निरा भाव से बहार निकलते...... मस्तिष्क में आशावादी ऊर्जा का संचार हुआ कि इन तीन साल के भीतर मेने बहुत कुछ खोने के साथ कुछ पाया भी सही? संशय अभी भी बरक़रार था..लेकिन ख़ुशी भी थी की इन निराशावादी माहोल से बाहर एक नए ठोर के लिए निकल पड़ा हु...........इस नए ठोर पर आये एक वर्ष में सवा दो माह का समय ही शेष रहा है....इस अवधि मैने कुछ गलतिया भी की....जो हुआ उसका मुझे आज मलाल नहीं...गलतियों से इन्सान हरदम सीखता है..में भी एक इन्सान हु.......मेने भी कुछ सिखा...मेरे इस नए ठोर मतलब मेरे जीवन की नयी राह पर पहुचने में मेरे पापा का बहुत मार्गदर्शन व बहुत सहयोग मिला...पापा और माँ से प्यार इतना की कभी सामने जाकर कहने की हिम्मत मेरा मन कभी नहीं कर पाया.....और ना कभी कर पायेगा...पापा भी चाहते है की में यही करू...और मेरा लगाव भी इसमें बढता चला गया.....बस अब उनकी ढेर सारी उम्मीदों को पूरा करू.... आज उस मुकाम पर पहुचने के लिए आ गया हु.....जिसका जवाब अपने आचार्य को दसवी क्लास और अपने मित्र को कहता रहता था...लोगो की जुबा से सुनता हु की इसमें स्ट्रगल बहुत ज्यादा है...पर हर काम में स्ट्रगल है...अपने काम से प्यार करना चाहिए...सब आसान लगेगा....स्ट्रगल कुछ नहीं होता है.... इस निराशावादी माहोल में मेरी भगवान के प्रति आस्था नहीं डगमगाई...मेने जिंदगी के तीन सालों में जो पाया,, वो आज मेरे बहुत काम आ रहा है..इसका सारा क्रेडिट माँ और पापा को जाता हु......(लव यू माँ और पापा)जो में उन्हें शायद कभी कह पाऊ...एक बार फिर उसे गुजरे दौर के बाद में खुश हु...बहुत खुश कहते है...चलती का नाम जिंदगी...(मेरे जीवन की सच्ची कहानी) -सिद्धार्थ शाह

Comments

  1. सिद्धार्थ जी संघर्ष ही इस मानव जीवन का आधार है

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    1. गौरव जी अब सीख लिया है। संघर्ष से खेलना। सब आसान लगता है, अब

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