थडियो, गलियों में घूमता बचपन...सपनों से नहीं वास्ता

थडियो, गलियों में घूमता बचपन...सपनों से नहीं वास्ता siddarth22.blogspot.in

आज का दिन, देश के करोडों युवा लोगो के लिए अहम् था, उसी तरह मेरे लिए भी.....सरकार गठन के हर पहलु पर मैने रूचि ली....ऐसा नहीं है कि पहले कभी ना ली हो...पर इस बार थोड़ी सी ज्यादा...क्यू ड्यूटी तो बनती है...ना
दिन सुबह से शाम तक दोस्त के यहाँ गुजरा...कारण भी था, स्पष्ट...टेलीविज़न जो लगा था......जाना तो बनता है....दोस्तों की टोली थी, तो टीवी चेनलों पर ईवीऍम पर नेताओ की आगे पीछे अच्छी दौड़ चल रही थी...(कहे तो कछुआ और खरगोश वाली) मजा तो बहुत आ रहा था...(बार बार कार्टून द्वारा दर्शको को हँसाना....) ऐसे में कोई भी, चाहे मैं हु या तुम सहज ही उससे जुड़े रहेंगे.....सभी की नज़रे गिद्द की तरह लगी पड़ी थी...

......सहसा एक बालक ने कमरे में प्रवेश किया....शाम ढलने को थी..समय अपनी दिशा में आगे बढ़ रहा था........मेरी नजर घड़ी पर गयी ही नहीं.....आज मेरे जैसे कई लोग, देश की जनता, इस सरकार बनने की घडी को देख रही थी........फिर इस घडी में, मैं उस घड़ी पर समय क्यों बर्बाद करू....सही कहा ना दोस्तों.......अकस्मात विद्युत् प्रवाह में अवरोध पैदा हो गया...बच्चा बोला, कांग्रेस सरकार ने ही बंद करवाई होगी....थोड़ी सी हंसी आई..(मेरे मुख पर मंद मुस्कान का भाव झलका....) मेने कहा ऐसा नहीं है...बस यहाँ तो, ये सब कुछ लगा रहता है.. ......

............वो बोला कौन बन रहा है...चीफ मिनिस्टर...मैने उसकी और देखा, कहा चीफ मिनिस्टर.......वो भी मेरी और देखता रहा.....मैने कहा की ये प्राइम मिनिस्टर की दौड़ भाग है....अब एक चाय वाला प्रधानमंत्री बनने वाला है...उसने कहा सच में...मैने कहा सच में....वो मुस्कराते हुए अपने पापा के साथ काम में लग गया...(मै भी उसकी ख़ुशी में अपनी ख़ुशी तलाश करने लगा) फिर बोला..बड़ी धीमी आवाज में.... मेरा नाम मेरे हाथ पर लिख दो....मेने कहा क्यू पढाई नहीं करते हो....वो कुछ सिर हिलाकर इन्कार कर दिया...मेने पूछा कहा से हो...वो बोला भैया परदेस से हु...मेने कहा पढ़ लो....काम आएगा....वो कुछ न बोला...........

पूरा देश एक जश्न के माहोल में डूबा था...मै भी अपने दोस्तों के साथ इस पल का मजा ले रहा था......लेकिन थोड़ी उदासी मेरे मन पर हावी होने लगी....सोचने लगा कि

ऐसे कितने बच्चे होंगे जो  (चाइल्ड लेबर) (बचपन) खेलने की उम्र में अपना समय (बालश्रम) श्रम में बीता रहे है..इन्हें देश का भविष्य कहे या चाहे कुछ और....लेकिन है तो बच्चा....पाठशाला जाने की उम्र में...काम में लग पड़ा है....उसके भी अपने सपने होंगे, जो पूरा करना चाहता है...क्या पता काम के बोझ में शायद सपने ही ना देख पा रहा हो...बचपन आज गुमनामी में कही खो गया....आज अँधेरा है...काली छाया ने उसे घेर लिया है...बचपन न जाने कहा खप गया है, कानून ढेरो बने है...पालन कौन करता है...और करवाता भी कौन है...(आजकल तो ले दे कर छुट्टी वाला मामला है) अपने आपसे से कैसे कहे कि...हो ही,........, नहीं पाता...उसे कौन वास्तविकता से परिचय कराएगा ?....

आज प्रश्नों की लम्बी कतार मेरे मस्तिक में उभर रही थी. कुछ तो अपने आप से सवाल जवाब करता रहा.......फिर सोचा उसके लिए परिस्थितिया के साथ आप और हम भी थोड़े बहुत जिम्मेदार है... ....आज पूरा देश बोल रहा है..अच्छे दिन आने वाले है.... .....बार बार यही प्रश्न मेरे मन को कुरेद रहा है... ......क्या उनका बचपन इन्ही किन्ही थडियो, गलियों में घूम हो जायेगा..या पाठशाला की और रुख कर पायेगा...क्या इनके बिगड़ते (खोते) बचपन को अच्छे दिनों की सौगात मिलेगी....अगर मिलेगी तो कब मिलेगी? 
(16 मई 2014) –सिद्धार्थ शाह डूंगरपुर

(मेरी ये लिखी बात आपको अच्छी लगे तो जरुर प्रतिकिया देवे...)

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