गांव अपना.....शहर सपना.....

गांव अपना.....शहर सपना.....

यहां की जिंदगी तेज रफ़्तार वाली है, समय कब निकलता है...पता ही नहीं चलता...सोचा,  बचा खुचा काम शाम को निपटा लू....तभी नजर घड़ी की ओर जाती है। (अपने आप से कहता हूं कि) शाम तो हो गई...ये तो धरा का धरा रह गया....कलम और कागज हाथ में उठा, काम करने में लग पड़ा। इस बीच रात भी तेजी से अपनी गति में बढ़ रही थी....सब अपने अपने काम में लगे थे...मेरा दोस्त संगीत सुनने में इतना तल्लीन हो गया...अपने आप में ही डूब गया। वो उस संगीत को सून, बाजार की ओर रूख किया...मुझे पता ही न था...वो बाजार की ओर कब निकल पड़ा।

(अलग अंदाज में बोला) बडे वाले हेडफोन ले आया.......फिर से वो संगीत की दूनिया में डूब गया। वो गाना भी बेहद खुबसूरत....तेरी ई गलियां आ.....गलियां....तेरी ई.....गलिया....मुझको भावे....गलिया आ...तेरी गलिया      मेरा दोस्त डूबा था,  अब मैं भी डूब गया...बस अंतर इतना था...वो संगीत की और मैं गांवों की दुनिया में डूब गया....सोचने लगा कि
गाँव.....(छोटा शब्द) इसमें अपनापन बहुत झलकता है। मैं भाग्यशाली हूं कि गांव में पला...गाँव की आबोहवा में बडी मिठास, प्रेम झलकता, मिट्टी की खूश्बू...बस हर कोई अपना लगता है। गाँव में इस गली में घूसे...उस गली से निकले.....पर शहरी आबोहवा में वो मजा नहीं, जिस शहर (नोएडा) में आया हूं बस एक सपने की तरह (जिसे पूरा करना है) है। 
यह तो अनजानों का शहर......पडौसियों का ही अता पता नहीं...................मेट्रो सिटी में आकर लाईफ स्टाईल बडी अजीब सी हो गई.... उगते और डूबते सूरज को देखा कई दिन बीत गए..........

शहर में रहने वाले भी, बरबस गांव की आबोहवा के लिए तरसते होंगे। शहर में कभी कभार दोस्तों की महफिल जमतीं, तो हंसी ठिठोली हो जाती...बडा सुकून मिलता.....(यहां वहां की बातों से, बात किसी भी टॉपिक पर हो, अन्ततः राजनीति पर आ टिकती) मेरा मन एकाग्र, स्थिर.... दरवाजा खुला,......हवा मंद मंद चल रही.......मानों मुझे कुछ कहना चाहती हो....मैं इनकी बातों को कैसे समझु ! ( न तो उसकी कोई जुबान थी,  न कोई शरीर, वो बोले ओर मैं झट से समझ लूं). पर मैं जागृत अवस्था में उसे महसूस कर पा रहा था। मुस्कूराहट का भाव क्षणिक फिर चेहरे पर आया........गाँव, वो गर्मी के दिन, खुला आंगन, खुली छत, आसमान में टिमटिमाते तारे...उनमें कुछ को गिनने की कोशिश....कुछ को अपने आगोश में समेटने की कोशिश.....सहर्ष मन, मस्तिष्क को एक अलग आंनद की अनुभूति होती थी...

( मेरे शयन स्थल की दीवार पर एक चित्र जो सुन्दर झोपडि़यां, खिलखिलाते पुष्प, पेडों की हरियाली, काम करता किसान, स्वर्ण बिखेरती सूरज की किरणें एवं नदी का छोर जो गांव की सभ्यता एवं संस्कृति को बयां कर रहा उसे मै एकटक निहारता रहा )

गांव में कुछ करीबी रिश्तेदारों का आना हुआ है........बहुत करीबी, इससे ज्यादा तो क्या कहंू...आए हुए छः दिन भी बीत चुके (इन दिनों को भी उंगलियों पर गिनना पड़ा) इनसे सहज ही मेरा, मेरे परिवार का दिल से लगाव है। उन्हें गाँव में रहना अच्छा लगता है, वे गांव को देश कहते है, तब मन को सुकून मिलता है। प्रफुल्लित हो उठता है.... वैसे कहते भी है, और सूना भी बहुत....कि भारत की दूनिया गांवों में ही बसती है। चेहरे पर बडी मुस्कराहट के साथ गर्व महसूस करता...मैं गांव का रहने वाला हूं...इसकी मिट्टी बडी प्यारी, खुश्बू वाली...बचपन इसी मिट्टी में बीता।

शहरों की चकाचौध में बीते बचपन को गांव ही नसीब नहीं हुआ। मेरी सहपाठी जो लडकी है, महाविद्यालय के परिसर में बस यू ही, एक दिन गांव पर बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। वो कहती है.........वाऊ.....बडे खुशनसीब हो तुम सब, मैं तो गांव ही नहीं देख पाती कोई रिश्तेदार ही नहीं...किसके यहां जाऊ....(उस की बातों में मायूसी का भाव झलक रहा, जो स्पष्ट उसके चेहरे पर नजर आ रहा...) मैंने कहा चलिए फिर.....ग्रामीण संस्कृति से आपको रूबरू कराते है। अब उसके चेहरे पर मुस्कराहट दिखी। सहपाठी (असमा) है, उसके जेहन में गाँव का अक्स...(कुछ इस तरह, उसके ही शब्दों में) कच्ची सड़के, नीम के पेड़ के नीचे छाव में बैठे अधेड़ उम्र के कुछ लोग, हाथ से हवा देने वाला पंखा, चौपाल का सीन उभरता है।

महानगर तो श्रण समय का मनोरंजन...पर असली सुन्दरता तो गाँव की..... गाँव को पुनर्जीवित करने का बीड़ा किसी न किसी को उठाना पड़ेगा.......आज भी गाँव बहुत सुन्दर....पर गाँव कहे तो सभ्यता और संस्कृति के प्रतीक भी है...इनकी सुन्दरता को कायम रखना तो होगा ही ना....आज नहीं तो कल...फिर देर क्यू...

शहरों की तंग गलियों से मुक्त होकर,,.......गाँव की गहरी यादों में...., एक ही बात ने दिल की खिडकियों पर दस्तक दी कहा.........गांव अपना... बस शहर सपना.....(20 मई 2014) ( यादों के साये में)

सिद्धार्थ शाह डूंगरपुर (राजस्थान)


  

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