राजनीति की पाठशाला. . . . .
(मार्च 2014)
देश एक ऐसे मोड़ पर खड़ा था, जब चहुंओर समस्याओं, चुनौतियों ने घेर रखा था। महंगाई, भ्रष्ट्राचार की नीत नई खुलती परतों से देश की जनता निराश थी। विश्वगुरू कहे जाने देश की विश्व स्तर पर फजीहत हो रही थी। जनता का लोकतंत्र से विश्वास कम होता जा रहा था। ऐसे समय में एक ऐसा व्यक्ति जिसकी मजबूत इच्छाषक्ति एवं इरादे ने उसकी साधारण पहचान को विशेष पहचान में तब्दील कर दिया। दिल्लीवासियों के लिए उम्मीद की किरण बनकर आया। वह आम लोगों के बीच आम रहा, लेकिन राजनीतिक मंच पर खास हो गया। उसके राजनीतिक सफर की कोई लम्बी कहानी नहीं है।
समाजसेवी बुजुर्ग सत्याग्रही अन्ना हजारे की नाव पर सवार होकर दिल्ली की सत्ता पर काबिज हो गया।
जी बिल्कुल, अरविंद केजरीवाल।
किसी ने सोचा नही था एक टोपी वाले व्यक्ति की आम आदमी पार्टी वह कर दिखाएगी जो अन्य दलों के लिए अंसभव था। यह कल्पना से परे जरूर है, लेकिन वास्तविकता से दूर नहीं।
आम आदमी पार्टी एक नई राजनीतिक ताकत बनकर उभरी। उस पार्टी का अरविेंद केजरीवाल वर्ष 2013 का सरताज बना। इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि उसकी पहचान भारत समेत विश्व के अनेक देशों में उभरी। दिल्ली को शीला के 15 साल के एकछत्र शासन से मुक्ति ने राजनीतिक गलियारों में भूकम्प सी स्थिति ला दी। सब कुछ सपना सा लग रहा था। आप पार्टी की सफलता से दोनों प्रमुख दल भाजपा, कांग्रेस बौखला गए है। इस छोेटी पार्टी ने अन्य दलों को अपनी रणनीति बदलने एवं सोचने के लिए मजबूर कर दिया। लोकसभा चुनाव की नजदीकी के साथ राजनीतिक दल अपना समीकरण बदलने एवं मजबूत करने में जुट गए।
जीत से पहले की बात करें तो दोनों प्रमुख दलों से इस पार्टी के बारे में पूछने पर यह कहते रहे है कि उनका मुकाबला इससे नहीं है, कहकर नकारते रहे। सट्टा बाजार ने भी इसको गौण रखा। इस पार्टी ने अन्य दलों को औधें मंूह गिरा दिया।
केजरीवाल का सफर पूरी तरह से समाजसेवी अन्ना हजारे के आंदोलन से श्ुारू हुआ, जो पहचान उसे उस आंदोलन से मिली वह शायद उसे ही मिल पाती। दिल्ली कहें तो आंदोलनों का केन्द्र बिन्दु रहा। बाबा रामदेव, अन्ना हजारे का आंदोलन दिल्ली में हुआ। दिल्ली में दिसम्बर 2012 का दुष्कर्म कांड दामिनी नाम से एक राष्ट्रीय आंदोलन बना। जिससे विभिन्न तबके के लोग जुड़ें। अन्ना हजारे के आंदोलन की रणनीति बनाने में भी केजरीवाल ने अपनी भूमिका निभाई थी। अपार जनसमर्थन मिलने के बाद इस आंदोलन की हवा मीडिया के माध्यम से देश के कोने कोने में पहुंची। गांवों से लेकर शहरों में इस आंदोलन को जो क्रेज था, उसका लाभ अरविंद केजरीवाल को मिला। अरविंद केजरीवाल की पार्टी बनाने की सोच पुरानी थी या नहीं इस बारे में कहना कुछ ठीक नहीं है, लेकिन जो हुआ वर्तमान भारतीय राजनीति के हालातों को देखते हुए ठीक है। इसने लोगों को विशेषकर मध्यमवर्गीय लोगों को अपने हक के लिए लडना सिखाया।
आम आदमी पार्टी अन्य राजनीतिक दलों से बिल्कुल भिन्न है। उसका प्रचार का तरीका भी थोडा हटकर है। इस पार्टी को वीआईपी कल्चर पसंद नहीं है। देष में फैल रही भ्रष्टाचार की जडें समाप्त करना उसने अपना लक्ष्य बना रखा है। इस पार्टी का गठन 26 नवम्बर 2012 को हुआ है। इस सबके साथ ही वह अपनी पार्टी को राष्ट्रीय पहचान देना चाहते है।
आम जनता के सन्दर्भ में एक बात कहना चाहता हूं कि देष में शायद पहली बार हुआ है जब कोई मुख्यमंत्री धरने पर बैठा हो। वह भी डेढ दिन का धरना। तीन पुलिस वालों के खिलाफ कार्रवाई एकमात्र उद्देश्य। इस बात से यह पता लगाया जा सकता है कि जब एक मुख्यमंत्री को पुलिस वालों के खिलाफ कार्रवाई के लिए इतना संघर्ष करना पड रहा है, तो आम जनता की क्या हालत होगी? आम आदमी पार्टी सत्ता में आने के साथ कई विवादों में भी गिरी। वह उस चुनौती का डटकर मुकाबला करते देेखने को मिल रही है। यूपीए-2 के सबसे खराब शासन के बाद यह पार्टी संघर्ष करने के साथ मीडिया में सुर्खियों में रह रही है। चुनौतियों के समंदर में भारत की जो स्थिति है, वहीं भिन्न भिन्न राजनीतिक दलों के बीच आम आदमी पार्टी की बन कर रह गई है। इसे चैतरफा राजनीति का षिकार होना पड रहा है। आम आदमी पार्टी की सोच उसे अन्य राजनीतिक दलों से अलग करती है। लेकिन जिस सोच के साथ आयी थी वह दिख नहीं पा रही है। लोकतंत्र में पार्टी का बनना और विलीन होना आम बात है।
राजनीति की प्राथमिक पाठशाला बनी ‘आप‘
-भारतीय राजनीति के परिदृष्य में आम आदमी पार्टी देष में अन्य प्रदेषों की सरकार के लिए वर्तमान समय में राजनीति की प्राथमिक पाठशाला का काम कर रही है। आप पार्टी का अस्तित्व एक मात्र दिल्ली प्रदेश में है कि अन्य राज्य उसकी सोच के साथ काम कर रहे है। तभी तो दिल्ली राजनीति का केन्द्र बिन्दु कहा जाता है।
आम आदमी पार्टी की सोच वाकई आम है, यह जीत के बाद देखने को मिला। तभी तो, वे स्वयं अपने दिल्ली मेट्रों सेवा का इस्तेमाल करते हुए शपथ ग्रहण समारोह में पहुंचे। जिससे लोगों की नजर में अपनी पेंठ ओर मजबूत कर ली। उसी समय कांग्रेस, भाजपा समेत अन्य राजनीतिक दलों को महसूूस हुआ कि लोगों में अपना एवं दलों का विष्वास कायम रखना है, तो लोगों के बीच सादगी एवं सरलता से रहना होगा। तभी यह पार्टी विभिन्न राज्यों के लिए प्रारभ्मिक पाठशाला बन गई है। राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ में विधानसभा चुनाव के बाद एवं उत्तरप्रदेश में सरकार ने इसका असर जरूर पडा, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। राजस्थान में वसुंधरा सरकार ने आते ही अपनी सुरक्षा व्यवस्था में 50 फीसदी तक की कटौती कर दी। ट्रेफिक सिग्नल पर आम आदमी की तरह रूकने हुए पालन करने, विशेष परिस्थितियों को छोड़ कर अन्य समय में हेलिकाॅप्टर को किराए पर देने की चर्चा, उत्तरप्रदेष के मुख्यमंत्री अखिलेख यादव का अपना सुरक्षा रेला आधा होना, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ में भ्रष्टाचार के लिए हेल्पलाईन नम्बर जारी करने में आम आदमी पार्टी का असर दिखा रहा है। भाजपा में भगवा टोपी देखने को मिली। महाराष्ट्र सरकार के दो जनप्रतिनिधि भी अपनी ही सरकार के खिलाफ बिजली बिल में कमी को लेकर अनशन पर बैठ गए। इन राज्यों की सरकारें आम आदमी पार्टी की तर्ज पर काम करने से कुछ हद तक सरकारी धन के दुरूपयोग में कमी आएगी। ऐसे में यह आम आदमी पार्टी जो सत्ता में आएं दो माह भी पूरे नहीं हुए वह भी एक मा़त्र विधानसभा क्षेत्र में अपना वर्चस्व रख रही है। उसने एक नई इबारत लिखकर राजनीति की पाठशाला का काम किया। इस पार्टी का महत्व इसलिए भी है कि क्योकि यह राजनीति के केन्द्र बिन्दु दिल्ली की सत्ता पर जमीं हुई है। ऐसे में राजनीति की पाठशाला कहना, बिल्कुल उपयुक्त है। इस पार्टी ने कम समय में राजनीति की जिन बुलन्दियों पर अपना वर्चस्व कायम किया है, जिसकी चर्चा देश के गांव गांव, गली मुहल्ले में है।
इस पार्टी ने यह साबित कर दिया है कि लोकतं़त्र जनता का, जनता के द्वारा, जनता के लिए।
-कहते है कि समय के साथ चलने वाला इंसान कठिन से कठिन डगर से आसानी से पार कर सकता है, यह आम आम आदमी पार्टी ने समय की मांग के अनुरूप किया। अन्य राजनीतिक दलों को समय के साथ चलने की जरूरत है। लोकतंत्र में जनता ही असली मालिक है। जनप्रतिनिधि सेवक है। पार्टिया पांच साल तक जनता का शोषण करती है और मतदाता भी अपना मौका आने पर हिसाब बराबर कर देती है कि जो इन विधानसभा चुनाव में देखने को मिला। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने वीआईपी कल्चर को समाप्त करने का जो बीड़ा उठाया उसे देश की जनता सलाम करती है। इस पार्टी के आने से राजनीतिक दल भी आम जन को साथ लेकर चलने की रणनीति में जुट गए है। लोकतंत्र की जडें तभी मजबूत होगी, जब स्वस्थ राजनीति को पनपने का मौका मिलेगा। प्रमुख दल लोकसभा चुनाव में अब ऐसे प्रत्याषियों को उतारना चाहेगा जो किसी तरह की आपराधिक गतिविधि से जुडें नहीं हो। अब ऐसे लोगों को मौका देेना चाहेंगे कि जिससे वाकई ईमानदारी के साथ कुछ कर गुजरने की क्षमता हो। देष में विकास के नए आयाम दे सकें। देष में स्वस्थ राजनीति को बढावा दे सकें। आप दिल्ली विधानसभा चुनाव में जीत के बाद आने वाले लोकसभा चुनाव में कुछ राज्यों में प्रत्याषियों को उतारने का मन बनाया। आम आदमी पार्टी ऐसे प्रत्याशियों के सामने अपने उम्मीदवारों को खड़ा करनी चाहती है जो भारतीय राजनीति में बडा महत्व रखते है। यह मुख्यतः उत्तरप्रदेश और हरियाणा की ओर अपना रूख कर रही है।
एक समय था जा जब महात्मा गांधी ने आजादी की लडाई के समय में टोपी भारतीय राजनीति का अहम हिस्सा बन गई थी जिसे गांधी टोपी के नाम से जाना जाता था। उसके बाद खादी की बनी सफेद टोपी की परम्परा देश में दो या तीन प्रधानमंत्रियों के समय में दिखी। बाद के समय के साथ यह टोपी की परम्परा भारतीय राजनीति से गायब होती गई। अन्ना हजारे के अंादोलन के बाद टोपी अपने नए रूप में वापस दिखी। अरविंद केजरीवाल अब अपनी ‘मैं हूं आम आदमी‘ टोपी के साथ नजर आ रहे है। भारतीय राजनीति में टोपी ने अपने कदम वापस रखे है। मुझे याद है कि साल 2014 के प्रारंभिक दिन 9 से 11 जनवरी तक मैं गृह निवास के जिले के धार्मिक यात्रा पर निकलते समय उस ग्रामीण क्षेत्र में एक व्यक्ति सडक पर दुपहिया वाहन में सवार होकर इसी टोपी के साथ गुजरा तो मुझे लगा कि यह पार्टी तो दिल्ली मैं होते हुए गांवों में अपनी पैठ जमा रही है। इससे बडी बात ओर क्या हो सकती है।
विभिन्न विवादों के बीच आम आदमी पार्टी आज भी लगातार अपने लक्ष्य के प्रति प्रयासरत है। चैतरफा राजनीति का शिकार होने के बाद अपनी लड़ाई लड रही है। वर्तमान सन्दर्भ में राजनीतिक दल अपनी सरकार को बचाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा देते है, ऐसे समय में उन्होंने अपनी कुर्सी कुर्बान कर देने की बात से सत्ता के गलियारों में हलचल मचा दी। वहीं भ्रष्टाचार के खिलाफ एक नया मोर्चा खोल कर देश के सबसे बडे अंबानी परिवार के मुकेष अंबानी जो रिलायंस इण्डस्ट्रीज से जुडे है, उन्हें भी गैस के मूल्य वृद्धि एवं मिलीभगत का आरोप लगाकर लपेटे में ले लिया। एन्टी करप्शन ब्यूरों ने अपना काम भी शुरू कर दिया। ऐसे में भाजपा एवं कांग्रेस दोनों दल इस पर कुछ कहने से बचने की कोशिश करते दिख रहे है। लेकिन सबसे बडी बात यह है कि क्या आरोप सिद्ध होगें, अगर नहीं हुए तो क्या होगा? उद्योगपति मुकेश अंबानी पर किया दांव कहीं कही आम आदमी पार्टी पर उल्टा पड गया तो क्या होगा लेकिन यह तो आने वाला समय ही बताएगा।
इस पार्टी का भविष्य क्या होगा यह पता नहीं है, लेकिन इसने वर्तमान राजनीतिक दलों को नसीहत का पाठ जरूर पढा दिया है कि अभी भी वक्त है, संभल जाओ। नही ंतो फिर इन्तजार किजिए........
सिद्धार्थ शाह डूंगरपुर
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यह लेख मार्च 2014 को लिखा गया है। इनमें उल्लेखित कुछ बातों को फरवरी 2014 में काॅलेज में वार्षिक प्रतिभा खोज प्रतियोगिता 2014 में प्रस्तुत किया था। उस समय विषय था-राजनीतिक क्षितिज पर आम आदमी पार्टी का उदय जिस पर मुझे काॅलेज स्तर पर प्रथम स्थान मिला
-सिद्धार्थ शाह विद्यार्थी माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल, नोएडा परिसर
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