वीरबाला की वीरगाथा

वीरबाला की वीरगाथा

राजस्थान वीरों की धरती रही है, इसमें अनेकों ने अपना रक्त बहाकर लोगों में प्रेरणा का भाव पैदा किया।
राजस्थान में 19 जून 1947 का दिन भारत के इतिहास में गौरवपूर्ण है। इसी दिन एक गुरूभक्त बारह वर्षीय बालिका ने अपने प्राणों की आहूति देकर शिक्षा के क्षेत्र में राजस्थान का नाम रोशन कर दिया। भारत की आजादी से पूर्व देश में फिरंगियों का शासन था। रियासतें भी उनके साथ काम किया करती थी। इन रियासतों में डूंगरपुर भी एक रियासत थी। जो वर्तमान में गुजरात सीमा से सटी है, जिसमें रास्तापाल गांव आता था।(जो वर्तमान में भी है) आदिवासियों के मसीहा गोविन्द गुरू के आह्वान पर सेंगाभाई गांव में पाठशाला चलाते थे, जो डूंगरपुर के महारावल को पसंद नहीं था। क्योकि वे क्षेत्र में शिक्षा का प्रसार नहीं चाहते थे। उस समय क्षेत्र में गोविंद गुरू लोगों को अपने अधिकारों के प्रति जागृत करने के काम में लगे थे। क्षेत्र में पाठशालाएं चलायी जा रही थी। रास्तापाल गांव में पाठशाला के लिए नानाभाई खाॅट ने अपना भवन दिया। शिक्षा की अलख लोगों में जग रही थी। महारावल को यह नहीं भा रहा था। महारावल ने कई बार अपने सैनिक को गांव में भेजकर पाठशाला बंद करने की चेतावनी दी। शिक्षक सेंगाभाई एवं नानाभाई खाॅट शिक्षा को लेकर अपने मत से नहीं डिगंे।
राजस्थान के इतिहास में यह अविस्मरणीय घटना 19 जून 1947 की है। इस दिन डूंगरपुर रियासत का एक अधिकारी सैनिकों के साथ रास्तापाल गांव आ पहुंचा। अधिकारी ने चेतावनी देते हुए पाठशाला को बंद करने कहा, वे नहीं माने जिस पर पुलिस अधिकारी ने शिक्षक संेगाभाई एवं नानाभाई खाॅट को बेंत एवं बंदुक की बट से मारना शुरू किया। वे अपने शिक्षा प्रेम के पथ से जरा भी नहीं ड़गमगाए। भवन दानकर्ता नानाभाई खाॅट का तन पुलिस अधिकारी की मार को सहन नहीं कर सका, अन्ततः प्राण त्याग दिए। शिक्षक सेंगाभाई को ट्रक के पीछे हिस्से में रस्सी से बांध दिया। पुलिस अधिकारी के क्रोध से किसी भी ग्रामीण में बोलने की शक्ति नहीं थी।
उस दौरान एक 12 वर्षीय भील बालिका जो उसी पाठशाला में अपने गुरू सेंगाभाई से पढ़ती थी।

जिसका नाम था, कालीबाई।

वह खेतों में काम कर घास लेकर लौट रही थी। हाथों में हंसिया लिए थी।

अपने गुरू को ट्रक के पीछे रस्सी से बंधी हालत में देखकर व्यथित हो उठी। इनको पकड़ने का कारण पूछा, तो पुलिस अधिकारी ने बता दिया कि रियासत के आदेश पर विद्यालय चलाने के कारण गिरफ्तार किया जा रहा है। तो कालीबाई तपाक से बोली, विद्यालय चलाना अपराध नहीं है। गोविंद गुरू कहते है शिक्षा ही विकास की कुंजी है। कालीबाई को इस प्रकार बोलता देख पुलिस अधिकारी बौखला उठा। कहा कि विद्यालय चलाने वाले को गोली मार दी जाएगी। कालीबाई ने कहा कि पहले मुझे गोली मार दो। इस बात से ग्रामीणों में उत्साह का संचार हुआ। ग्रामीण महारावल के खिलाफ नारेबाजी करने लगे। इस पर पुलिस अधिकारी ने ट्रक चलाने का आदेश दिया। बालिका कालीबाई ने फसल काटने के हंसिये से एक बार में रस्सी काट दी। यह सब देख पुलिस अधिकारी ने गुस्से में आकर पिस्तौल से कालीबाई पर गोली चला दी। ग्रामीणों ने गुस्से में आकर पथराव शुरू कर दिया। इसके बाद सैनिक वहां से भाग छूटे। रास्तापाल आने का साहस नहीं हुआ। वीरबाला कालीबाई ने अपने प्राणों की आहूति देकर अपने गुरू के प्राण बचा लिए। राजस्थान मं शिक्षा की ज्योति जलाने में वीरबाला कालीबाई का योगदान अमूल्य है। जिसका नाम आज भी गांव में गर्व से लिया जाता है। विद्यालय पाठ्यक्रम में भी इसकी बहादूरी के किस्से को बच्चों को पढ़ाया जाता है।
इस घटना के बाद भारत 15 अगस्त 1947 को आजाद हो गया। आजादी के इतने सालों बाद भी वीरबाला कालीबाई की पहचान राजस्थान के बाहर स्थापित नहीं हो सकी। राजस्थान के डंूंगरपुर जिले मे आदिवासियों की बडी आबादी है। यहां के बांसीया गांव में आदिवासियों के मसीहा गोविंद गुरू ने जन्म लेकर लेकर जन जागरूकता का काम किया। आज भी डूंगरपुर जिले एवं रास्तापाल गांव में इस वीरबाला के नाम पर ग्रामीण गद्गद् हो, फूलें नहीे समाते है।
लम्बी जद्दोजहद के बाद रास्तापाल गांव में वीरबाला कालीबाई नाम से प्राथमिक विद्यालय चल रहा है। राजस्थान के डूंगरपुर जिले को शिक्षा के क्षेत्र में अमिट और अनुठी पहचान देने में इस वीरबाला का महान योगदान छिपा है। आज भी गांव में इस वीरबाला का नाम बडे़ गर्व से लिया जाता है। इस छोटी बालिका ने वो कर दिखाया जो गांव का कोई अन्य नहीं कर पाया। इस बालिका ने अपना रक्त बहाकर शिक्षा को नवीन पहचान दी। राजस्थान सरकार को इस वीरबाला के बलिदानी दिवस को नयी पहचान देने की जरूरत है।
-सिद्धार्थ शाह
----------------------------------------------------------------------

Comments