बंद बोतलों में सिमटती जिदंगी..........

बंद बोतलों में सिमटती जिदंगी..........

राजस्थान से आया सुनील, नोएडा सेक्टर 16 में बस के इंतजार में खड़ा था। आज उम्मीद से भरे इस शहर में इसका पहला दिन था क्यूकिं वह नौकरी की तलाश में आया था। जून माह में यहां बड़ी तेज गर्मी पड़ती है। बस के लिए प्रतीक्षारत सुनील का चिलचिलाती धूप में गला सूखने लगा। आसपास प्यास बुझाने का उसे कोई ठोर नजर नहीं आ रहा था। हलक तर करने इधर उधर भटका भी,  पर निराशा ही हाथ लगी। तभी कुछ दूरी पर एक लडका दिखाई दिया। जिसे देखकर उसके चेहरे पर थोडा सा ओज आया। निराशावादी मन में एक उम्मीद दिखी...ठेले के पास जाकर अपनी प्यास बुझा हलक तो तर कर दिया, पर जैसे ही वो बस स्टॉप की ओर रूख करने लगा तो ठेले पर खड़ा लडका बोला....भईया पैसे तो देकर जाईये.... कुछ सोचने के बाद जेब टटोलते हुए सिक्के निकाल बच्चे को थमा दिए। लेकिन तब उसके आश्चर्य का ठिकाना ना रहा जब उसे पानी के लिए मोल चुकाना पडा। फिर वह बस स्टॉप पहुंच अपनी आगे की राह पर निकल पड़ा। सुनील अकेला नहीं है, जिसके साथ ऐसा हुआ यहां आने वाले हर शक्स की कुछ यहीं कहानी है।

सुनील कहता है कि राजस्थान..चले जाईये आपको हर जगह प्याऊ व निःशुल्क पेयजल गला तर करने के लिए मिल ही जाएगा। यहां तो पग पग पर पानी के लिए पानी की तरह ही पैसा बहाना पड़ रहा है। इस आधुनिक शहर नोएडा में हर कोई अपने सपने को पूरा करने की उम्मीद के साथ कदम रखता है। क्यूकिं आज एक बडी कॉरपोरेट सिटी जो बन चुकी है। यहां हर किसी को प्यास बुझाने के लिए कदम कदम पर पैसा अदा करना पड़ता है। 
पहले एक कहावत हुआ करती थी कि पानी का मोल जानना हो तो रेगिस्तान में रहने वाले लोगों से पूछो....कि पानी क्या है.? अब यह पूरी तरह से नोएडा शहर में भी चरितार्थ हो रही है।
यहाँ यदि किसी की जेब खाली हो तो उसके लिए यहां की राह अब आसान नहीं है। इस पूरे शहर मे पेयजल एक बडे स्तर का व्यवसाय बन गया है। यहां ऑटो चालक हो, आम नागरिक हो, मजदूर हो, नौकरीपेशा वर्ग हो या चाहे वो विद्यार्थी हो...हर किसी को पानी के लिए जेब ढ़ीली करनी ही पड़ती है। इस नए बसे शहर के बस स्टाॅप हो या मेटो स्टेशन कही पर भी सार्वजनिक पेयजल की व्यवस्था नहीं दिखती है। थक हार कर पैसे से ही प्यास बुझानी पड़ती है। अब यह एक मजबूरी का सबब बनकर रह गया है। इस जून की तपती धूप में बिना बर्फ मिलाए पानी गले से उतरना मुनासिब ही नहीं है। यहां तो बर्फ भी ठेलों पर दस रूपए किलों के दाम बिक रही है। बडा अजीब शहर है......पर जीवन का कटू अनुभव....सत्य से रूबरू होना भी हर किसी के लिए जरूरी है।

इस पेयजल को एक व्यवसाय बनने में सरकार के साथ नोएडा प्राधिकरण की भूमिका सवालों के घेरे में है। केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकार सभी पानी समेत अन्य योजनाओं पर पानी की तरह पैसा बहा रही है, लेकिन क्रियान्वयन सही तरीके से नहीं हो पा रहा है। नोएडा प्राधिकरण को कम से कम की बस स्टाॅप एवं मेटो स्टेशन के बाहर तो सुविधा देना तो बनता है।
नोएडा में पेयजल बंद बोत्तल, पानी पाउचों में सिमट कर ही रह गया है। किसी को गिलास में पानी पीने की इच्छा हो गई, तो ढूंढ़ने पर ठेलों पर मिल जाएगा। यहां पर अधिकांशत पानी सिक्कों में बिका करता है........नोएडा में सिक्कों की टकसाल जो है। ऐसे शहर में पानी तो गिलास से शुरू होकर बोतलों में बंद हो जाता है। दूर दूर तक प्याऊ ही नजर नहीं आते है, ऐसे में जेब में हाथ ड़ालना ही पड़ता है। बस दूर दूर तक निराशा ही दिखती है। मूझे कुछ दिन पूर्व का संस्मरण याद आ रहा है मैं आॅटों की प्रतीक्षा कर रहा था....पास में ही ठेले पर पानी भी मिल रहा था तभी एक वृद्धा पास आयी.....बोली कुछ दे दो मैंने कहा मेरे पास कुछ नहीं है....आप आगे जाईये...वो बडी आशा से बोली कुछ ना सही पानी ही पिला दो....उसकी ओर देखने लगा एक गिलास पानी ठेले वाले से कह कर पिला दिया....इस शहर में शुद्ध पानी की चाह सभी को है, पर इनका दर्द कौन समझे.......
जिस शहर में आम लोगों को पीने के लिए पानी के लिए मशक्कत करनी पड़ रही है, वहां बेजुबां पशुधन, पंछियों के लिए पानी कहां नसीब होगा। उनकी कौन सुनेगा.....किसको परवाह.....फर्राटेदार....चिकनी सड़कों पर किसी के पास कोई वक्त नहीं है.....बस सब दौड़े जा रहे है...वो भी अपनी धून में....

नाम तो नहीं पता लेकिन किसी ने खूब कहा है-

प्यास बुझानी है तो उड जा पंछी शहर की सरहदों से दूर,यहां तो तेरे हिस्से का पानी भी प्लास्टिक की बोतलों में बंद है........

इस पंक्तियों में छिपे दर्द को आप सभी ने महसूस किया होगा। हम तो इस चकाचैंध की चमक को देखकर आ गए है, लेकिन तेरे पास तो पंख है.... उड जा इस दूर गगन में कहीं ओर, उन सुकून के पलों के लिए जो यहां नहीं है। जिस देश में दूध की नदियां बहा करती थी, उस देश में आज वहां पानी पर भी जंग सी छिड़ी हुई है। यहां तो जिंदगी बस बोतल में सिमटती जा रही है।

.........सिद्धार्थ शाह

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