जख्म कुरेद गयी सरकारी हवा....
शाम को एक मित्र का कॉल आया.. कहने लगा की राजस्थान
में सरकार आपके द्वार कार्यक्रम तो मात्र एक ढोंग है..मेने बोला हुआ क्या ? वो तो
बताओ..वो बोला हमारे यहाँ तो सरकार का कोई मंत्री ही नहीं आया...और भेज दिया
सरकारी अफसर को...क्या हमारी समस्या इतनी मूल्यहीन है कि सरकार के पास हमारे लिए वक़्त
नहीं है..हमको तो महारानी साहेब से ये उम्मीद नहीं थी, कि कोई मंत्री ही न मिला हो
मेरे डूंगरपुर जिले के सीमलवाडा इलाके के लिए..
यहाँ आते तो समस्याओ का अकूत भंडार उनके
लिए खोल दिया जाता....पर आये ही नहीं, उनके लिए जान बची लाखो पाए कहना ही ठीक
रहेगा..
सरकार के सरकार आपके द्वार कार्यक्रम से आस जुडी थी
कि अब हमारी समस्याओ को हमारे गाँव में ही सुन, समझ कर त्वरित निदान किया जायेगा....जब
से मेने इस विषय में रूचि ली है... सरकारी नौकरशाह इतने सतर्क तो उससे पहले तो कभी
नहीं देखा.....रविवार को भी काम करते दिखे थे.....लेकिन सरकार के किसी मंत्री के
लोगो के बीच नहीं आने से लोगो की उम्मीद को बड़ा झटका लगा है..
जब किसी नेता को जनता से वोट निकलने होते है तो गाँव में
डेरा जमा देता है..पर सत्ता मिलते ही उस गाँव की मिटटी को भूल जाते है...जिसने उसे
उस ओहदे पर बिठाया है...
फिजूल खर्ची कर सरकारी धन को किस तरह चुना लगाया जाये...इसमें
यह सरकार आपके द्वार अभियान पूरी तरह मानो फिट हो रहा है...जनसुनवाई तो जिला
कलेक्टर साहेब द्वरा भी मासिक आयोजित की जाती है..उसमे भी समस्या आती है...उसमे भी
समाधान की मोहलत दी जाती है..पर होता कुछ नहीं है..
सरकार खुद गाँव के द्वार आयी है तो समस्या का समाधान मौके
पर ना होकर उसके लिए 15 दिन का समय देना कहा उचित है...सरकार आपके द्वार का फिर
क्या मतलब रह गया...पंचायत से एक व्यक्ति ही सारी समस्या बताए....क्या किसी और को
बोलने का हक नहीं है क्या...ये भी सरकारी नियम में आता है क्या...तो हमें भी
बताओ...
सरकार का कोई मंत्री नहीं आया. कोई बात नहीं...चलो बड़े गाँव
में अफसर तो आया..लेकिन बड़े बाबु के पास भी समय नहीं था...बगल के कस्बे सीमलवाडा
में तो दस मिनट ही टिक पाए...अरे जल्दी क्या थी...बार बार तो आते नहीं हो....आपके
तो दर्शन दुर्लब है...आये थे तो थोडा और टिकते...इससे ज्यादा तो आपकी सरकारी
रोडवेज़ की बस रूकती है......और तो और आपके पास तो सरकाई गाड़ी भी थी...फिर ऐसी
जल्दबाजी क्यू...
और तो और मेरे गाँव में तो दो पंचायतो का सम्मिलित आयोजन
करवा दिया... और समस्या दो लोगो के मुख से सुन इति श्री कर ली....उससे अच्छा की
आते ही नहीं तो और बढ़िया होता...जख्म तो नहीं कुरेदते आप....दर्द तो हमें ही होता
है...आप क्या जाने ...पत्र तो बाहर ही लेकर रसीद थमा दी गयी...
बड़ी जल्दी में थी
सरकार मानो यहाँ से सीधा विधानसभा और फिर फ्लाइट पकडनी हो...जिस चलाये गए अभियान
में सरकार के पास लोगो के लिए वक़्त नहीं है...ऐसी सरकार की पहचान आम जन आसानी से
कर सकता है...
ऐसा अभियान चलाने की सरकार को क्या आवश्यकता पड़ गयी कि
जिसका कोई निर्धारित शिडयुल नहीं. पर्याप्त समय नही..वसुंधरा सरकार को यदि लोगो का
आभार जताना ही चाहती थी तो, एक यात्रा निकाल देती...इतने बड़े स्तर पर नाटक की क्या
कोई जरुरत थी...आप ही बताओ..सरकारी पैसे का दुरुपयोग करना क्या और कहा तक उचित
था......बस जनता के जख्म कुरेदने का अच्छा नाटक किया सरकार ने...पर मरहम लगाने का
आश्वासन जरुर देती गयी...बस प्रतीक्षा कर रही है जनता उस मरहम की, जिससे उनके ये घाव
ठीक हो जाये...जिसे हरा कर गयी... फिर ये सरकारी हवा...
सिद्धार्थ शाह डूंगरपुर
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