हमारे एक मि़त्र के द्वारा बनाए भोजन की बड़ी
चर्चा होती है। हमने भी सोचा क्यूं न उसके वहां दावत पर जाया जाएं। मन हीं मन सोचा
जैसे सभी दो हाथों से बनाते हैं, वैसे ही वह भी दो हाथों से ही बनाता
होगा। चर्चा हो रही है, तो मित्र में कुछ बात होगी। मित्रों की टोली
उसके हाथों से बनाए भोजन के स्वाद के लिए बड़े लालायित व उतावले थे। मानों भोजन का
स्वाद ना चखा, तो मर ही जाएंगे। दो दिन तक यहीं चर्चा चलती रही कि कैसे जाया जाएं ?
कई
बार हंसी ठिठोली करके जानबुझकर उसे भोजन का निमंत्रण देने के लिए हम कह देते थे।
पर कोई बात नहीं बन पायी।
हम सभी दोस्त अपने परिवार से दूर एक अनजाने शहर में रहते
हैं। यहां मित्रों की टोली हमारा परिवार होता है। सभी के साथ पैसे की समस्या
स्वाभाविक सी है। शहर में रहते हुए इंसान भले ही कुछ ना सीखें, लेकिन
प्रबंधन का गुण अवश्य सीख जाता है।
आखिर एक दिन फोन की घंटी बज उठी। दावत-ए-मित्र
ने दावत-ए-भोजन के लिए सबको अपने आशियाने पर आमंत्रित किया। दोपहर के तीन बजे बजे
थे। तभी मित्र हमें लेने हमारे कक्ष में पहुंच गया। (चेहरे से लग रहा था कि बड़ी
जल्दबाजी में था। जैसै अभी किलां फतह करना हो) आते ही कहने लगा जल्दी चलो, भोजन
बनाना है। मैंने कहा, मित्रों का ही भोजन है या पूरे गांव का। इतनी
जल्दीबाजी क्यूं हो रही है ? किसी के जेहन में क्या चल रहा हो,
भला
कौन जान सकता है। तभी बोल पड़ा, अनार का रायता बनाना है..... तभी एक दम
कक्ष में शांति छा गयी मानो कोई घटना घट गयी हो। हमने कहां ये क्या बलां है। सुनने
में सभी को बडा अजीब सा लगा। इसका भी रायता बनता होगा ? वह बोला,
मैं
तो बनाता हूं। सभी ने कहा, फिर आज तो हो जाएं पूरी दावत-ए-भोजन।
बेचारा मित्र चिल्लाता रहा भाई चलो...भाई चलो..ऐसा करते करते शाम के छ: बज गए। (मित्र
के मस्तिष्क में क्या दौड़ रहा है, उसे हम समझ नहीं पा रहे थे) अब हम उसके
आशियाने की तरफ रवाना हुए। हम उसके कक्ष के पास रात्रि 8 बजे पहुंचे। (ये प्रश्न तो उठा होगा आपके जेहन में. दुरी में महज चंद फासले थे,इतनी
देर क्यूं) हुआं
यूं कि मित्र हमें इस गली से उस गली, सब्जी मंडी से किराणा की दुकान,
फल
विक्रेता से डेयरी की दुकान पर घुमाता रहा। मानो पिछले कुछ समय से खरीदारी ही नहीं
की हो।
तभी हम महिला फल विक्रेता के पास पहुंचे। मित्र बोला, रायते
के लिए दो अनार ले लो। फल विक्रेता कहने लगी, अनार का रायता।
वह भी हंस पडी। तो हम समझ गए कि मित्र पत्रकारिता का छा़त्र है, तो
कुछ भोजन में नया रिसर्च या प्रयोग करने वाला है। कोई ओर हंसे, उससे
पहले हम वहां से आगे की दुकान के लिए खिसक पडे़।
अगली दुकान पर जब उसने जीरा और
काला नमक खरीदा तो मैं समझ गया कि मित्र के आशियाने के रसोईघर में कुछ दिनों से स्थायी
शांतिहै। मानों किचन स्वयं सामग्री की बाट जोह रहा हो। मेरी और मेरे एक मित्र की
तो हंसी निकल पड़ी। हमने किसी तरह से अपनी हंसी को रोक पूछने की कोशिश की। उससे
पहले वही बोल पड़ा कि भाई आज ही सामान खत्म हुआ है।
अब हम रा़त्रि आठ बजे उसके रूम
के पास पहुंचे तो पता चला कि ताले की चांबी खो गयी। मित्र चिंतित हो गया। बाहर
दोस्तों की टोली। आशियाना पर लटका ताला। एक बार तो बोल दिया की आज तो खाना बन गया
समझो..चाबी ढूंढने में आधा घंटा बीत गया। सभी जगह से निराशा ही हाथ लगी। वह हमें
किसी अन्य मित्र के वहां बिठाकर चाबी का प्रबंध करने निकल पड़ा। जब वापस आया तो हाथों
में ताला तोड़ने की हथौड़ी। मि़त्र ने एक झटके में ताला तोड़ दिया जैसे कि उसे इस
कार्य में उसे महारथ हासिल हो। हमारे साथ आसपास वालों की हंसी छिपाये नहीं छिप रही
थी। वह भी हंसने लगा।
ताला तोडकर दावत-ए-भोजन...........
किराणा की सामग्री का पैसा हमारे एक अन्य मित्र
ने निकाला जिसे हम रिजर्व बैंक कहते है। वो वहीं हिसाब लेकर बैठ गया। कहने लगा कि 30
रूपएं का हिसाब नहीं मिल रहा है। खर्चं कहां हुआ होगा ? सभी ने कहा कि इतनी
भी क्या जल्दी, बाद में लगा देना। दावत-ए-मित्र बोला, 30
रूपएं का खर्चां हुआ है, लिख दो। सब पूछने लगे भाई कहां पर
खर्चां हुआ, ये तो बताओं। वो मौन हो गया मानो कोई आफत आ गयी हो। थोड़ी देर बाद फिर
पूछा तो मित्र बोला, आप सब मिलकर मेरा मजाक करोंगे। मैंने कहा हम
तुम्हारे दोस्त है। (पर मन में यह बात उठ रही थी कि हर एक फ्रेंड कमीना होता है)।
बता भी दो। वो कहने लगा अरहर की दाल पर खर्चं किया। तो सब जोर से हंस पड़े। हसं के
लोट-पोट हो गए। कहने लगा हमें पता था सब हंसोंगे इसलिए मैं नहीं बता रहा था। हम सब
ने कहा कोई बात नहीं होता रहता है ऐसा तो।
वह अपनी किचन की सच्चाई को हमसें छुपा
रहा था...कई दिनों से किचन में बिना राशन के सन्नाटा था.पर यहां तो सब एक जैसे ही
है। लंबे इंतजार के बाद भोजन की मस्त महक आने लगी। आखिर दो घंटे बाद भोजन की
प्रतीक्षा समाप्त हुई। सभी ने मिलकर दावत-ए-भोजन का भरपूर लुत्फ़ उठाया।
वो पल आ
गया, जिसका सबको इंतजार था.....अनार का रायता। जिसका स्वाद चखने पर मन झूम उठा।
मित्र की तारीफ में वाह... वाह... निकल पड़ा।
-सिद्धार्थ शाह डूंगरपुर
सत्य को बहुत ही उत्तम तरीके से प्रस्तुत किया। वास्तव में आनंद अनार के रायते में नही था बल्कि उस प्रेम में था जो सब साथ में भोजन कर रहे थे
ReplyDelete5 october aane wala hai dost.
ReplyDeletephir se sath milkar bhojan karna hai.