यह कैसी राजनीति....

वर्त्तमान समय में राजनीति किसी भी वस्तु के निर्धारण की इकाई बन गयी है. आज किसी भी विषय को आसानी से राजनीति से जोड़ दिया जाता है. इन सब से ऊपर उठने की जरूरत है..क्या देश में ऐसे मुद्दे नहीं है, जिन पर सभी पार्टियां मिलकर काम कर सके ? आम इंसान राजनीति के पचड़ों में नहीं पड़ना चाहता है. 
जब देश में ठण्ड में ठिठुरता इंसान गरीबी को कोसता हुआ दम तोड़ देता है..उसके लिए राजनीति क्या है? पहले तो स्वयं अपना भरण पोषण करना, उसका स्वयं के अस्तित्व के साथ संघर्ष. जब इंसान परेशानियों में गुजर बसर कर रहा है, तो उसे राजनीति के बारे में सोचने की फुर्सत कहा. 
मेरे गाँव के मोहल्ले में कुछ वर्ष पूर्व एक व्यक्ति कहते है कि राजनीति से हमारा कोई लेना देना नही..उनकी इस बात पर गौर करे, तो सही भी है..इनमें पड़ने लगे तो परिवार का कल्याण हो गया..

दिल्ली में विश्व हिंदू कांग्रेस के आयोजन में एक महिला ने सवाल उठाया कि आज हिन्दू शब्द का राजनीतिकरण हो गया है...इस शब्द का राजनीतिकरण करना क्या उचित है..आज हिन्दू मतलब भारतीय जनता पार्टी हो गया है...उसके इस प्रश्न पर कई सभ्रान्त नागरिकों ने मौखिक सहमति दिखाई..तो उसने अपने इस प्रश्न पर चिंता भी व्यक्त की.. वाकई उनका प्रश्न चिंतनीय है कि यदि व्यक्ति किसी संगठन से जुडा नहीं है, तो क्या वह हिन्दू नहीं है? क्या किसी संगठन में आस्था एवम विश्वास रखना ही हिन्दू कहलाता है ? आम इंसान किसी संगठन में जुड़ना नहीं चाहता है...तो क्या वह हिन्दू नहीं है

विश्व हिंदू परिषद के नेता अशोक सिंघल ने यह बयान दिया कि "दिल्ली में 800 सालों के बाद हिंदू सरकार बनी है" तो क्या इससे पहले भारतीय राजनीति में बनी सरकारें क्या थी...श्री अटल बिहारी वाजपेयी, श्री लालबहादुर शास्त्री ने भी देश का नेतृत्व किया था..तो फिर वे सब क्या थे? इनके बयान ने तो सम्मानीय वाजपेयी जी और शास्त्री जी की सरकार पर सवालिया निशान लगा दिया है..सरकारें कभी हिन्दू और मुस्लिम नहीं हो सकती है..सरकार क्या किसी वर्ग विशेष की है. हमने तो यही सुना है कि सरकार तो लोकतान्त्रिक होती है..जनता द्वारा चुने गए जन प्रतिनिधियों से सरकार का निर्माण होता है..

लोकतंत्र में जनता और उसका शासन सर्वोपरि होता है.संगठन और उसके नेता कहते है कि यह हमारी सरकार और यह तुम्हारी सरकार, तो फिर जनता कहां जाये...लोकतंत्र में जनता शब्द गौण हो गया है..आज लोकतंत्र को बांटे में तुले हैं. सरकारें तो जनता से ही बनती है..फिर यह कैसी राजनीति....
लोकतंत्र में क्या इसकी और उसकी सरकार....            -सिद्धार्थ शाह डूंगरपुर.


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