और चाय ठंडी पड़ गयी....

और चाय ठंडी पड़ गयी....

सर्दियों के समय में चाय की चुस्कियाँ लेना एक आनंददायी अनुभव होता है.इन सर्दियों में यह शहर सुबह से रात तक घने कोहरे की चादर में लिपटा हुआ होता है, इसमें कुछ लोग बिना चादर लपेटे ठिठुरते हुए सो जाते है. जेहन में उभरते कई चित्रों के बीच रूम से बाहर निकलना टेडी खीर होती है..लेकिन चाय की बात थी, तो मित्र के साथ हो लिए. 
हम उस जगह आ पहुचे थे, जो मुख्य सड़क के पास थी. ऊँची-ऊँची इमारतों के बीच की जगह थी. वहां फैली पीली रोशनी में कई लोग अपने अपने कार्यो में व्यस्त थे. कोई अलाव से अपने शरीर को ताप रहा था. कोई अपने मित्रों से, कोई अपने प्रेमिका से बतिया रहा था. कुछ सब्जी से लेकर रोजमर्रा की चीजों की खरीदारी में लगे थे. हाथ रगड़ते हुए चाय की चुस्कियाँ लेने वाले भी कम नहीं थे. जीवन में बुलेट ट्रेन की भाति व्यस्तता और फुर्सत के पलों का मिला जुला संयोजन का दृश्य बी ब्लॉक बाजार में देखने को मिल सकता है. 
इतनी ठंडी में चाय का कप हाथ में हो तो नजर इधर उधर घूम ही जाती है. मेरी भी घूम रही थी. उसी क्षण एक दृश्य ने दिल और दिमाग से मुझे उससे जोड़ दिया. मुझे यह दृश्य कुछ ख़ास लग रहा था...वह भी इस इतनी व्यस्तता के बीच एक अजीब सी ख़ुशी. यह दृश्य था करीब तीस साल की महिला और पांच छोटे-छोटे बच्चों का. इसमें एक और मुस्कान और दूसरी और उत्सुकता का जबरदस्त संयोजन था. बच्चों के कपड़े गंदे से थे. सर्दी से बचाव के लिए शरीर पर पर्याप्त वस्त्र थे. इस दृश्य मैं अपने सवालात कर जवाब स्वयं दे रहा था. बच्चों में मेम साहब क्या देगी? यह उत्सुकता दिख रही थी. ऐसी ही कुछ झलकियाँ उस समय आंखों के सामने थी .महिला बारी बारी से बच्चों को पेस्ट्री एवम विविध सामग्री दे रही थी..उस दृश्य में कई बार ऐसा लगा कि बच्चों से ज्यादा उत्सुकता महिला में थी..वह बच्चों से शायद नाम पूछकर, कुछ सवाल करते हुए सामग्री दे रही थी..बच्चे खाने की सामग्री प्राप्त करने में जल्दबाजी भी कर रहे थे. वह साथ में समझा भी रही थी. ऐसा नहीं करते. 
इस पुरे दृश्य में बच्चों के चेहरे से एक क्षण के लिए भी मुस्कान लुप्त होते नहीं दिखी. मुस्कुराह्ते चेहरे के पीछे भी एक पीड़ा थी. उन्हें कुछ गरमागरम खाने की प्रबल इच्छा थी. जो समोसे मिलने से पूरी हो गयी. उन बच्चो ने सर्दी कि परवाह किए बिना झट से निचे बैठे कर खाने लगे. मैं उनके पास जाने की कोशिश कर रहा था. पर कदम साथ नहीं दे रहे हैं...किसी छोटे बच्चे के चेहरें पर मुस्कान देख कर जो ख़ुशी मिलती है.उससे लगता है कि ये भी जिंदगी का हिस्सा है. छोटी छोटी जरूरतों में भी एक अजीब ख़ुशी होती है..किसी की छोटी जरूरतों को पूरा कर ख़ुशी मिलती है. तो किसी को उसे पूरा होते देख बड़ी तसल्ली मिलती है. इनका सिलसिला अनवरत चलता रहता है, जिंदगी के इन हिस्सों को हम देखना नहीं चाहते है. या दिखायी नहीं देते. इन दृश्यों के फेर में मेरी चाय ठंडी पड़ गयी. अब एक ही घूट में चाय हलक से मुस्कुराहट के साथ उतर गयी. - सिद्धार्थ शाह डूंगरपुर.

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