ब्रांडेड ज़माने में फीका पड़ा चेहरा...

नयी वस्तु पुरानी चीज़ों की किंमत कम कर देती है या फिर बाजारवादी संस्कृति में गौण स्थान पर ले जाती है। आजकल नयी वस्तु सभी को बहुत भांति है और जब वह ब्रांडेड हो तो लोगों की पहली पसंद होती है। जैसे कि मोदी जी एक ब्रांड भी है और नयी वस्तु भी। ऐसे में लोगोँ का उनके प्रति आकर्षण है...और ऐसा लग रहा है कि आडवाणी साहब भाजपा के लिए एक पुरानी वस्तु की माफिक हो गए है. जो बाजार में टिकाऊ नहीं है और जो टिकाऊ नहीं है उसे ज्यादा पसंद नहीं किया जा  सकता है....बेंगलुरु में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में जो कुछ हुआ भारत के लोकतंत्रीय इतिहास में आसानी से नकारा नहीं जा सकता है। आडवाणी साहब का खामोश, मूकदर्शक नजर आना राजनीतिक गलियारों में ढ़ेरों सवाल खड़े करता है। हमारे प्रधानमंत्री जी कहते है कि राजनीति में सकारात्मक आलोचना स्वीकार्य है...तो फिर आडवाणी जी को भी भाषण में अपनी बात कहने का मौका अवश्य देना चाहिए था...अरे वे ऐसा क्या बोलने वाले थे कि जिससे पार्टी की नैय्या डूब जाती?                                  एक कहावत है जब समय ख़राब हो तो हाथी पर बैठे इंसान को भी कुत्ता काट लेता है..आडवाणी जी के साथ यही हुआ है। जब पार्टी मजबूत स्थिति में है तो हर दिन भाजपा के कार्यो से अलग किया जा रहा है। उनकी हालत बिन बुलाये मेहमान की तरह हो गयी है..उन्हें भाजपा ने मार्गदर्शक के इतने बड़े पद से नवाज दिया है कि कोई मार्गदर्शन ही नहीं लेता है...साहब जी को पार्टी ने मार्गदर्शक का पद देकर मानों सोने का ताज दे दिया है ऐसी बात हो रही है। जो रंग बेंगलुरु की बैठक से दिख रहे है उससे ऐसा लग रहा है कि अगर मौका दिया गया होता तो सम्पूर्ण भाजपा के हाथों से मौका निकल जाता। डर था की कहीँ आडवाणी साहब भूमि अधिग्रहण अध्यादेश या किसी विषय पर कुछ ऐसा ना बोल दें कि पार्टी के किये कराये पर पानी फिर जाएं..साहब ने खुद मना किया हो या चाहे कुछ भी कारण रहे हो, पर जिसने भाजपा रूपी पौधे को पेड़ का आकार दिया..उनके साथ यह व्यवहार ठीक नहीं लगता है। -सिद्धार्थ शाह

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