अज्ञातवास से घर वापसी..

"मौका मौका" वाला ऐड तो आपने देखा ही होगा। बड़ा ही रोमांचक ऐड था। उसमे बड़ी ताजगी और अदब जोश था। पर वह मौका तो भारत के हाथ से निकल गया..और बना बनाया फाइनल ऐड भी धरा का धरा रह गया।                                                    अब एक और मौका आया है युवराज की घर वापसी का। युवराज मतलब शहजादे साहब की बात कर रहा हू..इन साहब को कौन नहीं जानता है। शहजादे साहब ने अज्ञातवास के बाद ऐसी धांसू एंट्री मारी कि पूरे परिवार में खुशियां छा गयी। आतिशबाजी होने लगी। कोई पन्ने पलटने लगा तो, कोई गूगल बाबा की मदद लेने लगा कि साहब कहां थे और क्या कर रहे थे? भाई साहब इतनी जल्दबाजी ठीक नहीं है। समय आने पर सब पता चल जायेगा कहां थे और क्या सिखने गए थे।                                                                   एक भाई साहब तो अखबार पढ़ते ही बोल पड़े कि बड़ा लंबा अज्ञातवास था। अच्छा हुआ जो सही समय पर घर वापसी हो ही गयी। और हद तो तब हो गयी जब उनके लापता होने क पोस्टर ऐसी चर्चा में रहे.. मानों किसी मां का बच्चा गुम हो गया हो और मिल ही नहीं रहा हो। रिश्तेदार, पडौसी ऐसे छटपटा रहे है कि मानों उनका सामान लेकर भागा हो।                                                                          भैया इसमें छटपटाने की क्या बात शहजादे साहब को "आ अब लौट चले" वाला गीत याद आया तो भावुक हो गए। एक दम से दौड़ लगा देश लौट आएं। इसमें बात का बतंगड़ बनाने की जरुरत नहीं है। हमारे चाय वाले भी तो बाहर ही थे तो किसी को तो यहाँ रहना ही पड़ेगा ना...लोग तो टुकुर टुकुर अख़बार देख रिया ही। पडोसी तो इस बात से खुश है कि हमने शहजादे की  घर वापसी करा दी और दुःखी इस बात नजर आ रहे है कि अब हमारा क्या होगा। एक राजकुमार की वापसी के किस्से जानने में लोग इतने खुश है कि पूरा अखबार पढ़ने लगे है किस कोने में कौनसी खबर मिल जाएं और हमारे काम आ सकें। इनकी भी बड़ी टीआरपी है। और हमारे चाय वाले की तरह यह भी एक ब्रांड है, तभी तो जानने को उत्सुक नजर आ रहे है। अज्ञातवास और घर वापसी जैसे शब्द ने शहजादे ही नहीं पूरे परिवार की घर वापसी करा दी है। और चार चाँद भी लगा दिए। यदि शहजादे साहब को परिवार के वर्तमान और भविष्य को लेकर चिंता है तो अच्छी बात है। और उसके लिए आत्मचिंतन कर रहे थे तो यह सोने पर सुहागा होगा...लेकिन परिवार की स्थिति में सुधार तो आना ही चाहिए। नहीं तो वही ढ़ाक के तीन पात वाली स्थिति बनकर रह जाएगी। वैसे भी अज्ञातवास का संबंध प्राचीनकाल से और घर वापसी का वर्तमान से। ये दोनों ही राजनीति में बड़े प्रचलित शब्द है। यह दोनों इन पर सटीक बैठते हैं। इसलिए इनका आत्मचिंतन दिखना चाहिए तभी मौका मौका सार्थक सिद्ध होगा नहीं तो 56 दिन का हिसाब भी शुरू हो जाएगा। क्योंकि जब परिवार परेशान हो तो पिकनिक अच्छा नहीं लगता है।   -सिद्धार्थ शाह डूंगरपुर
        

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