हर व्यक्ति जीवन में ख्वाहिशों के ख्वाब बुनता है। सबकी अपनी ख्वाहिशे होती है। सुबह की शुरूआत इसी उम्मीद के साथ होती है कि आज उन ख्वाहिशों को पंख लगेंगे..वह गगन चुंबी इमारतों को छुएंगे। उन्हें पूरा करने आसमान में कोसों दूर उड़ेंगे। हर कोई चाहता है कि मेरी ख्वाहिश पूरी हो। उसमें वह जी जान से लग जाता है...मानों उसके बिना सब कुछ अधूरा सा है। इसके लिए न जाने कितनी मन्नते..कितनी प्रार्थना...दुआ करता है। वह मतलब ईश्वर हमारी बात को सुनेगा..और पूरा करेगा। मानों वह पूरी नहीं हुई तो कुछ नहीं बचा। उसके बारे में सोचकर ही चेहरे पर मुस्कान छा जाती है..अजीब सी।
उन ख्वाहिशों के बारे में जब सोचते हैं तो वह दर्द को भी मीठा बना देती है। हम सब उन पलों के लिए बहुत कुछ सोच रखते हैं। जब यह ख्वाहिश पूरी नहीं होती है तो हम आस्तिकता और नास्तिकता के बीच उलझ कर रह जाते हैं। सोचते है कि हमारी प्रार्थना इतनी कमजोर थी कि पूरी ना हो सकें।असरदार बनाने के लिए प्रार्थना में क्या कमी रह गई थी। आखिर हमारे साथ ही ऐसा क्यूं होता है। इस चिंतन, मनन पर हम कितना वक्त निकाल लेते है...खुद को पता ही नहीं चलता।
मुझे लगता है कि हर व्यक्ति को स्वयं पर मनन जरूर करना चाहिए...आखिर मैं क्या हूं। सच कहता हूं कि कुछ जवाब तो अवश्य निकलेगा। चाहे वह नास्तिक ही क्यू ना हो। सभी को अपने अाप से बात जरूर करनी चाहिए कि क्यूंकि जो मन कहता है वह और कोई नहीं कह पाएगा। हम अपने आप से जो सवाल करते हैं और जो जवाब मिलते है...कुछ हटकर होते हैं..हर कोई इसका जवाब नहीं दे सकता है। अपने आप से बात करने का मजा भी कुछ अलग है। एक मित्र यही कहता है कि मन की आवाज को हम कभी सुन नहीं पाते हैं..अध्यात्म की राह से मन की आवाज को सुना जा सकता है..एक बार कोशिश करके सबको देखना चाहिए...
चिंतन, मनन से पहले मुझे उससे ढ़ेरों शिकायत थी। कुछ दिन तक उलझा रहा नास्तिकता एवं आस्तिकता के भंवर में। लेकिन अब कोई गिले शिकवे नहीं है। मित्र ने जब बताया तो मैंने भी अपने आप से बात की...मुझे भी कुछ जवाब मिले रोचक। जिसे हम ख्वाहिश का नाम दिया करते थे। वह प्रार्थना के दौरान खास ख्वाहिश बन गई थी। खास हमेशा सबसे अलग, सबसे हटकर होता है।
मन की आवाज जो हमारे लफ्जों, शब्दों में नहीं आ पाती है वह हमारी प्रार्थना के दौरान उन तक पहुंच जाती है। मन की आवाज को ईश्वर सबसे अधिक समझता है। जब कुछ बुरा होता है, तो ईश्वर को कोसते हैं। वह खास कब बन जाती है, यह हमें पता ही नहीं चलता है। कब..किस मोड़ पर....जिसका अध्यात्म में विश्वास है...उसे चिंतन के दौरान उसकी जानकारी अवश्य मिल जाती है।
पर चिंतन, मनन के बाद लगता है कि हमारी प्रार्थना वाकई असरदार थी...उसने हमारे बारे में कुछ अलग सोच के रखा है। कहते है कि जो होता है...अच्छे के लिए होता है। हमारी दुआ में दम था, जो सब कुछ अच्छा किया। कहते है कि हम किसी का बुरा नहीं करते हैं, तो वह भी हमारा बुरा नहीं करता है।
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सिद्धार्थ शाह
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