पापा से सीखा...

उसने मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ा। चाहे वक़्त अच्छा रहा हो या बुरा, हमेशा साथ निभाया। चाहे कोई भी परेशानी हो, उसने मुझे ढांढस दिया। पग पग पर मेरा सहारा बनी। उसने मुझसे कभी कोई शिकायत नहीं की। वो मुझसे कई बार रूठी। वह आसानी से मान भी गई। वह मेरी शिकायत करे भी तो किससे। सच कहू तो उसने मेरी हर बात को सुना, महुसुस किया। एक रूप दिया और उसे यादगार बनाया। वो मुझसे बेइंतहा मोहब्बत करती है, तभी तो मेरा साथ निभा रही है।   
वो कोई और नहीं : मेरी कलम...  
                                                                                    
इस कलम से मेरा पहला परिचय पापा ने कराया। कलम तलवार की धार से तेज होती है। पापा की इसी बात ने कलम से बेइंतहा मोहब्बत करना सीखा दिया। कलम मेरे हाथों तक कैसे आई। यह बड़ी लंबी कहानी है। वह संघर्ष के दिन थे। बस उन दिनों की परिस्थितयाें ने मुझे मजबूत बनाया। आज यह कलम सब कुछ समझती है। आज मेरी कलम मन की भावना को समझ, कोरे कागज को एक पत्र बना देती है। कलम कभी कभी मेरे सच्चे दोस्त के रूप में मार्गदर्शन करती है। कलम से इतना जुनून, प्यार पापा की वजह से हो पाया।  
                                                                                                         
कलम जब हाथ में होती है, तो सब कुछ भूल जाता हूं। यहाँ तक अपने आप को भुला देता हूं। इसके लिए सभी को शिकायत रहती है। खास कर घर पर भी शिकायत रही। माँ से कई बार डांट भी पड़ चुकी है कि तुझे तो खाने के लिए भी दस बार बुलाना पड़ता है। और मैं मुस्कुरा देता हूं। टेबल पर पड़ी चाय ठंडी होती रहती है और मैं मां से चाय देने की आवाज लगाता रहता हूं। मां की आवाज आती है तेरा ध्यान किधर रहता है। आज भी पहले कॉल पर माँ पूछ लेती है खाना खाया या नहीं? उसके चेहरे पर मुस्कराहट लाने कभी कभी झूठ भी बोलना पड़ता है। 

कहते है किसी का सपना इंसान को गंभीर बनाकर काम में तल्लीनता ला देता हैं। मेरे साथ भी यही हुआ। आज मेरी कलम का वास्तविक स्वरुप मेरे पास मौजूद हैं। जब वह चलती है, तो रुकने का नाम नहीं लेती है। सच कहु तो मेरी कलम ने मुझे सीख दी, निःस्वार्थ प्रेम की।                                                                                                                                   
कलम बहुत कुछ कहती है, पर कभी समझ नहीं पाया। कलम को समझने हुनर पापा से सीखा। कलम मेरा शौक जरूर है, लेकिन इससे किसी का सपना जुड़ा है। जिसे मुझे पूरा करना है। उस सपने को बेहद खूबसूरत भी बनाना है। जब सपना किसी और का हो, तो वहां सब कुछ लगा देना पड़ता है। यह सपना किसी और ने नहीं, मेरे पापा का है। पापा की वजह से कलम से अटूट मोहब्बत हो पाई। मेरी कलम बोलती नहीं है, लेकिन दर्द की तस्वीर खींच लेती है। मेरी कलम बहुत उस्ताद है। 

मेरी कलम से : आंधी और तूफान ने इस कदर रुख मोड़ दिया कि हम पीछे देखना भूल गए।
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सिद्धार्थ शाह

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