जब जिंदगी में सुनापन, अकेलापन, कोई मायूसी हो तो हमें सोशल साइट्स का सहारा मिलता है...भरपूर प्यार मिलता है। यह कितना सही है और कितना गलत है..यह बाद का विषय। लेकिन इस 21 वीं सदी के दौर में सोशल मीडिया ने नैतिक पतन के साथ पीछे धकेलने का काम किया है। परिवार से भी दूरी बना दी। जो परिवार संयुक्त रूप से चल रहे थे, उन्हें भी सोशल साइट्स ने एकल बना दिया...बस हम एक छोटे से मोबाइल मेंं सिमट कर रहना चाहते है.. कोई किसी का फोन छीन ले लेता है, तो वह क्या नहीं कर जाता है। उस पर गुस्सा तक हो जाते हैं। सोशल साइट्स ने लोगों के बीच रिश्तों की नींव कमजोर की है।
जब कोई त्यौहार होता है तो हम घर परिवार के साथ बाद में, पहले मोबाइल से शुभकामनाएं व्हाट्स एप करनी होती है। यहां सोशल होने के फेर में घर परिवार को समय नहीं दे पाते हैं। जब घर परिवार में बातचीत का सिलसिला शुरू होता है, तो बार बार मोबाइल चैक करना हमें अनसोशल होना फील कराता है...क्या यह सही..यह तो चिंतन का विषय है...पहले हम अंग्रेजों के गुलाम थे, आदी हो गए थे। अब सोशल साइट्स के आदी हो गए है। क्या इसके लिए भी कोई क्रांति होगी।
फेसबुक एवं व्हाट्स में उलझकर हमें ऐसा चक्रव्यूह बना लेते है, जिससे हम बंद आंखों से सपने देख लेते हैं। दोस्तों के बीच हम पास खड़े दोस्तों को महत्वहीन कर देते हैं और अन्य दोस्त से मैसेज टू मैसेज बात करने लग जाते हैं। यहां पर सोचने का विषय है क्या हम सोशल है, जो हमारे पास है, उसे महत्वहीन कर दिया। मैं सोशल साइट्स का विरोधी नहीं हूं। यह भी समय के साथ जरूरी है..पर इसे स्वयं को सीमित करना बहुत जरूरी है।
मोबाइल पर फेसबुक एवं व्हाट्स एप चलाने के चक्कर में सडक़ पर आगे आने वाला गड्डा भी नहीं दिखें, आप गड्डे में गिर जाए। और फिर कोई बचाने भी नहीं आए तो क्या होगा। जो हम सामाजिकता कर रहे थे, वह किसी काम आएगी..नहीं ना..तो क्या आप सोशल है...व्हाट्स पर पर सोशल होने के चक्कर में सडक़ हादसे में घायल व्यक्ति को हम किसी प्रकार की मदद नहीं करते है तो यह सोचने की जरूरत है...हम कितने सोशल है...सडक़ पर भूखे बच्चे की आप मदद नहीं कर पाते है और फेसबुक पर गरीब एवं गरीबी के हिमायती बन जाना तो उचित नहीं लगता है...वहां स्वयं को मनन करने की जरूरत है...क्या हम सही है...
युवा वर्ग सोशल साइट्स के इस दौर में फेसबुक एवं व्हाट्स में इतना घुल मिल गया है कि वह कई सुनहरे सपने देखता है...जब वह टूटते है...तो भंवरजाल में फंस जाता है, जहां से निकलना उसके लिए मुश्किल हो जाता है...इस आभासी दुनिया से थोड़ा बाहर निकल कर वास्तविक खूबसूरती को फील करना चाहिए...हम जब माता पिता के पास हो तो शरीर के साथ हमारा मन भी वही होना चाहिए। आभासी मतलब वर्चुअल दुनिया बहुत खोखली है...इसे समझना होगा...जब आप किसी को खो देंगे..तब आप इसे समझ जाओगे....कितने अनसोशल हो चुके है हम...
दूसरा पार्ट...जल्द ही...
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सिद्धार्थ शाह


सर अपने बिल्कुल सही कहा। हम आधुनिक बनने और आगे बढ़ने की चाह में अपने परिवार से ही दूर हो रहे हैं। नई तकनीकों का प्रयोग करना अच्छी बात है लेकिन उसे अपनी आदत बना लेना सही नहीं है। आदत कब लत बन जाती है हमें पता ही नहीं चलता।
ReplyDeleteसर अपने बिल्कुल सही कहा। हम आधुनिक बनने और आगे बढ़ने की चाह में अपने परिवार से ही दूर हो रहे हैं। नई तकनीकों का प्रयोग करना अच्छी बात है लेकिन उसे अपनी आदत बना लेना सही नहीं है। आदत कब लत बन जाती है हमें पता ही नहीं चलता।
ReplyDeleteवक्त के साथ बदलाव की जरूरत है...
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