निराले अंदाज वाली वागड़ की होली
वागड़ अंचल की होली का अंदाज ही निराला है। जनजाति क्षेत्र होने के कारण होली के अलग-अलग रंग रूप दिखाई देते हैं। जैसे ब्रज की होली में प्रेम व भक्ति का रंग चारों तरफ बिखरा रहता है, वहीं वागड़ अंचल की होली में शोर्य, साहस व शक्ति का रंग दिखता है। यहां ढोल की थाप पर गेर नृत्य, ढूंढोत्सव का रोमांच रहता है, वहीं अंगारों पर नंगे पाव चलने की परंपरा लोगों को दातों तले अंगुली दबाने को मजबूर कर देती है। लोग बताते है कि इनमें से कुछ परपंराओं का वैज्ञानिक महत्व भी है, जो स्वास्थ्य से जुड़ी है। अजब गजब रंगों वाली होली।
यहां दहकते अंगारों पर नंगे पाव चलने की परंपरा
जिले के कोकापुर गांव में पवित्र होली पर नंगे पाव चलने की परंपरा बरसों से है। होलिका दहन के दूसरे दिन अल सुबह होली माता के प्रति अपनी आस्था प्रकट करते हैं। ग्रामीण ढोल बजाते हुए होली चौक पर एकत्र होते हैं। गांव के प्रताप तेली नहा धोकर मंदिर में पूजा अर्चना करते हैं। गांव की तरफ से दिए जाने वाले श्रीफल को होली पर लेकर आते हैं। यहां होली माता की प्रदक्षिणा कर श्रीफल समर्पित किया जाता है। इसके बाद दाहिना पैर आगे कर दहकते अंगारों से गुजरते हैं। इस दौरान होली माता के जयकारे लगते हैं। प्रताप तेली पिछले 45 सालों से इस परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। इसके पीछे मान्यता है कि दहकते अंगारों पर तीन पग भरने से वर्ष भर निरोगी रहा जाता है। बताया जा रहा है कि होलिका दहन की यह संस्कृति सामाजिक एकता का परिचय दे रही है।
भीलूड़ा में खेली जाती है पत्थरों की राड़
भीलूडा गंाव में धूलेण्ड़ी के दिन पत्थरों की राड़ खेली जाती है। गंाव के प्रसिद्घ रघुनाथजी मंदिर के पास खाली भू-भाग पर शाम को दो समूहों में लोगों की टोलियां आमने-सामने होकर एक-दूसरे पर पत्थरों की बौछार करती है। रस्सी से बने गोफण से लगभग दो घंटों तक खेल चलता है। प्राचीन समय से बनी ढाल से बचने की कोशिश करते हैं। राड़ खेलने वाले व देखने वालों के मुंह से ‘हो ह ह रिया’ की गगनभेदी आवाजों से गुंजायमान राड़ स्थल प्राचीन समय के युद्घस्थल से कम नहीं लगता है।
मिट्टी से बनते है चुगलखोर साडियाजी
अनूठी परपंरा के तहत कोकापुर के पोल का कोठा एवं सेवकवाड़ा में वर्षों से एक ही जगह पर खड़े पत्थर पर होली के दिन मिट्टïी से साडिय़ाजी की प्रतिमा बनाई जाती है। इसमें अश्लीलता का पुट होते हुए भी लोग इसे भावनात्मक रूप से देखते हैं। राजा महाराजा के समय में जनता की बातों से राजा के कान भरने वालों की कमी नहीं थी। इस अवगुण के कारण लोग उन्हें साडिया (चुगली करने वाला) कहते थे। राजा से चुगलखोर की शिकायत करने की हिम्मत किसी में नहीं थी। लोगों ने चुगलीखोर की मिट्टïी से नग्र प्रतिमा बनाकर समाज में उसकी प्रताडऩा व ठिठोली उड़ाई। चेतावनी देने वाली यह परम्परा वर्तमान में भी जारी है। हस्तशिल्प से पारंगत लोग बिना किसी नाप तौल के प्रतिवर्ष मिट्टïी से होली पर ऐसी प्रतिमाओं को बनाते हैं। इसे देखने बड़ी संख्या में लोग एकत्रित होते हैं। समाज में भी चुगली करने वालों को इस दौरान चिड़ाने से नहीं चूकते।
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सिद्धार्थ शाह

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