रथोत्सव मेले की बरसों पुरानी पंरपरा को बरकरार रखने कम राशि में दिया खेल मैदान...
—अधिक लोग पहुंचे मेले, यह है उद्देश्य
—मेला तोड़ने की कोशिश हम बताएंगे आपको उदाहरण के जरिये...!
डूंगरपुर। रथोत्सव मेला सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। डूंगरपुर में बेणेश्वर के बाद पीठ का रथोत्सव मेला अपनी प्रसिद्धि प्राप्त किए हुए है। आस्था का केंद्र इसलिए है क्योंकि भगवान को कालिया देव के नाम जानते हैं। लेकिन देखने में आ रहा है कि पिछले तीन वर्ष से मेले को तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। सिर्फ व्यवसायिकता ही मेले का एकमात्र उद्देश्य नहीं है। इस मेले में तीन राज्यों के व्यापारियों के आने के साथ करीब 50 हजार लोग शामिल होते हैं। अधिकाधिक लोगों को शामिल होकर परिवार समेत मेले का लुत्फ उठा सकें। यह मेले का लक्ष्य है।
हम आपको उदाहरण के माध्यम से मेले को तोड़े जाने की कहानी से अवगत करा रहे हैं। जैसा कि बताया जा रहा है कि 90 हजार रुपये में खेल मैदान मनोरंजन के साधनों के लिए दिया गया। लेकिन आखिर 90 हजार रूपये में क्यों दिया गया इसके पीछे की बात हम आपको बता रहे है। जिन मनोरंजन के साधनों के मेलार्थियों को 30 से 40 रुपये देने पड़ रहे हैं। यदि पांच लाख रुपये में खेल मैदान दिया जाता है तो आप सोच सकते हैं कि यह टिकट राशि कितनी देनी होगी।
शायद 100 रुपये या उससे अधिक। इसके बाद भी कोई गारंटी नहीं कि मेले को आने वाले समय के लिए लगाने के लिए आगे आए। मनोरंजन के साधनों की राशि अधिक होने पर करीब 50 हजार लोगों की भीड जुटाने वाले मेले में ग्रामीणों की संख्या धीरे धीरे कम हो जाएगी। ओर मेला समाप्त हो जाएगा। शायद यह पहला ऐसा मेला है रथोत्सव के प्रति आस्था, मनोरंजन के साधनों का लुत्फ, ग्रामीण संस्कृति का दर्शन होता है। जिस काम के लिए मेलार्थियों को 20 रुपये देने पड़ते है, उसी काम के लिए 50 से 100 रुपये क्यों दे।
मेले के नाम पर कुछ लोग राजनीति कर रहे हैं। मेला इसलिए लगता है ताकि आपको सस्ती व अच्छी वस्तुएं उपलब्ध हो। जो वस्तु 30 रुपये में मिल रही है। पांच लाख रुपये की खातिर 80 रुपये में मिलेगी। क्या कोई उस वस्तु को खरीदेगा। यदि कोई नहीं खरीदेगा तो मेला स्वत: समाप्त हो जाएगा। जो स्टॉल पांच से दस हजार रुपये में दिया जा रहा है। वह 50 हजार रुपये में देकर व्यापारियों को यहां हमेशा का आना बंद करने की अप्रत्यक्ष रूप से प्लानिंग है। हमारी यह बात समझ में आ गई होगी। अब तक आपको सिर्फ एक पक्षीय स्थिति से अवगत कराया है, लेकिन हम आपको दोनों पक्षो से अवगत करा रहे है।
सर्व धर्म एवं सामाजिक सद्भाव का प्रतीक
रथोत्सव मेले से पीठ कस्बे की पहचान बनी हुई है। यह चार से पांच दिन तक चलता है। लेकिन कतिपय लोग मेले को तोड़ने की जीतोड़ कोशिश कर रहे हैं। जिन लोगों को आगे कर मेले को तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। वह सिर्फ इस विवाद के नाम पर अपना स्वार्थ साध रहे हैं। हम आपको बता दें कि यह मेला बरसों से लग रहा है। यहां पर गुजरात, मध्यप्रदेश व महाराष्ट के व्यापारी पहुंचते हैं। व्यवसायिकता की आड़ में सिर्फ मेले को समाप्त करने के लिए कार्य किया जा रहा है। गांव के हित के लिए, मेलार्थियों के हित के लिए, सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने के लिए कुछ अच्छा हो तो यह उन लोगों को पसंद नहीं है।
पिछले तीन वर्षो की स्थिति देखे तो मेला रात 10 या 11 बजते ही बंद कर दिया जाता है। रात के समय कतिपय लोग मेले का माहौल खराब करते हैं। पुलिस प्रशासन मेले को बंद करा देता है। आखिर पुलिस का कार्य उन लोगों पर निगरानी रखकर कड़ी कार्रवाई करना है, लेकिन पिछले तीन चार वर्षो में सिर्फ कोताही बरती गई है। जब हमने बुजुर्गो से बात की तो पता चला कि आज से 20 पहले मेला दिन व रात अनवरत चलता था। सुबह चार बजे भी मनोरंजन के साधन चलते रहते थे। लेकिन आखिर यह परिवर्तन आया क्यूं। कुछ लोग को गांव में मेला लगे, यह पसंद नहीं हैं। इसके लिए वह हरसंभव प्रयास कर रहे है। कुछ लोगों को अभी जीवन के अनुभवों में कमी है। उनका वास्तविकता व हकीकत की दुनिया से वास्ता नहीं हुआ है। यह हर बात को रुपये से जोड़ते है। यह सब संस्कृति व मेला हित के लिए किया गया है। आपको हमारी यह बात पसंद आई है तो जवाब जरूर दें।

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