’’अहिंसा परमो धर्म ’’एक प्रिय संदेश महावीर स्वामी का जैन धर्म के अंतिम 24 वें तीर्थकर भगवान महावीर स्वामी की आज जन्म जयन्ति है। यह त्यौहार पूरे देश में बडे उत्साह एवं उल्लास के साथ मनाया जाता है। आज ही के दिन भारत की पावन मिट्टी पर अलौकिक महापुरूष का जन्म हुआ था। 2600 वर्ष बाद भी भगवान महावीर के संदेश, सिद्धान्त एवं आदर्श आज भी बहुत प्रासंगिक है। भगवान महावीर स्वामी का जन्म चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को बिहार राज्य के कुंडलपुर वैशाली में ईसा से 599 वर्ष पहले हुआ था। वर्तमान में यह स्थान बिहार के मुजफफरपुर जिले का बसाढगांव है। क्षत्रिय परिवार में पिता राजा सिद्धार्थ एवं माता त्रिशला से महावीर स्वामी का जन्म हुआ था, उनका बचपन का नाम वर्द्धमान था। वे एक राजपरिवार में जन्में थे। उनका बचपन राजमहल में बीता। घर में सुख सम्पदा, धन, ऐश्वर्य की कोई कमी नहीं थी। तीस वर्ष की उम्र में घर का त्याग कर दिया। सब कुछ छोडकर कष्टों की कठिन राह पर निकल पडे। कठिन तपस्या से उन्होंने अपने ज्ञान से विश्व को परिचय कराया कि महानताा भौतिक सुख सुविधाओं एवं पदार्थो से नहीं आती है। उसके लिए सत्य को अपनाना पडता है। नैतिकता की राह पर चल अंहिसा जीवन शैली से महानता प्राप्त की जा सकती है। बारह वर्ष की आराधना के बाद 30 वर्ष तक मानव समुदाय एवं प्राणी मात्र के कल्याण के लिए जीएं। उन्होंने तपस्या, साधना के द्वारा बहुत अनुभव प्रात किए। दुनिया को स्नेह का पाठ पढाया। अहिंसा की मूल शिक्षा से परिचय कराया। अहिंसा परमो धर्मए जीयो और जीनें दो के संदेश, पंच महाव्रत से दुनिया को परिचय कराया। देश और दुनिया में अहिंसा की ज्योति जलाने वाले भगवान को वीर, अतिवीर, सन्मति, वर्द्धमान एवं महावीर नाम से पुकारा जाता है। पांच नामों से पुकारे जाने के पीछे भी कुछ कारण है। भगवान महावीर स्वामी के अनुयायियों की कमी नहीं है। जैन हो या अजैन सभी श्रद्धा एवं आस्था से पूजते है। जैन धर्मावलम्बी इस त्यौहार पर धार्मिक आयोजन, जूलुस के साथ भगवान के संदेश प्रचारित करते है। जैन धर्मावलम्बी महावीर स्वामी की जयन्ति पर पंचामृत अभिषेक, जलाभिषेक, पूजन, सन्ध्याकालीन सांस्कृतिक कार्यक्रम, प्रभातफेरी, जुलूस के द्वारा बडे उत्साह से मनाते है। देश के ग्रामीण और शहरी क्षेत्र में तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी की शोभायात्रा, गंधकुटी में भगवान को विराजित कर निकालते है। भगवान की शोभायात्रा में नृत्य के साथ माहौल भक्तिमय बन जाता है। भगवान महावीर का जीयो और जीने दो का सिद्धान्त यही कहता है कि हम दूसरों से ऐसा व्यवहार करें जो हमें पसंद है एवं उनसे अपेक्षा रखते है। दुनिया को अपने उपदेशों के माध्यम से पंच महाव्रत बताएं। आत्मिक एवं शाश्वत सुख की प्राप्ति महावीर स्वामी के इन सिद्धान्तों से प्राप्त की जा सकती है। महावीर स्वामी ने अंहिंसा, सत्य, क्षमा, ब्रहमचर्य, अपरिग्रह, धर्म पर उपदेश दिए। देश के विभिन्न स्थानों पर महावीर स्वामी ने अपने संदेशों को फैलाया।महावीर स्वामी ने 72 वर्ष की आयु में पावापुरी में कार्तिक कृष्णा अमावस्या को निर्वाण प्राप्त किया। जरूरत अपनाने की-वर्तमान राजनीतिक एवं सामाजिक वातावरण में भगवान महावीर स्वामी के आदर्शो एवं सिद्धान्तों को जीवन में उतारने की जरूरत है। वर्तमान राजनीति में वैर भाव आ गया है। जो राजनीतिक एवं सामाजिकता के लिए ठिक नहीं है। महावीर स्वामी ने अपने आदर्शो से मानव से मानव को प्रेम करना सिखाया है। लेकिन वर्तमान राजनीति में न तो भाईचारा रह गया है। न हीं प्रेमभाव रह गया है रह गई है तो सिर्फ सकिर्ण मानसिकता। आज की राजनीति में एक दूसरे को बडा बताने के लिए कुछ भी बोल दिया जाता है। आज की राजनीति सभी को बांटने का काम कर रही है। जो देश के लिए एकता के लिए किसी भी हालात में ठीक नहीं है। उन्हेें महावीर स्वामी के आदर्शो को अपनाने की जरूरूत है। विश्व को पढाया अहिंसा का पाठ-भगवान महावीर की शिक्षा में मूलतः अहिंसा है। अहिंसा से भगवान महावीर स्वामी का गहरा रिश्ता जुड गया है, जो कभी अलग नहीं हो सकता है। सीधा सा अर्थ अहिंसा से यह लगाया जाता है कि किसी को अपने स्वार्थ के लिए दुःखी नहीं करना। पशु बली, पशुओं का वध, मांस भक्षण को तो हिंसा माना है लेकिन किसी के प्रति घृणा एवं बुरे विचार को हिंसा की श्रेणी में रखा है। ऐसी अंहिंसा किस काम की जिसमें प्रेम ना हो। सत्य और अहिंसा को जगत में रूबरू कराया। अहिंसा को जगत में प्रसिद्धि महावीर स्वामी ने दिलवायी। विद्यार्थियों को महावीर स्वामी के आदर्शो को आत्मसात् कर अपने जीवन में उतारना चाहिए। स्वाधीनता आंदोलन के समय में महात्मा गांधी ने जिस अंहिंसा को अपना सशक्त हथियार बनाया था। मानव जाति को अपनाने के लिए प्रेरित किया। उस अहिंसा परमो धर्म को महावीर स्वामी ने विश्व को बताया। यह अहिंसा महावीर का प्रिय संदेश है। महावीर स्वामी ने अपने उनदेशों से मानव समाज का कल्याण किया। सत्य का पालन करो, अहिंसा को अपनाओ, जीयो और जीने दो का उपदेश दिया उनका कहना है कि आज मानव ने अहिंसा को भुला दिया है। संसार में समस्त प्राणियों को अपना जीवन अति प्रिय है। जो नष्ट करने में तैयार रहता है वह हिंसक है। जो उसकी रक्षा में आगे आता है वहीं मानव है। पंच नाम के पीछे औचित्य-भगवान महावीर स्वामी को महावीर के अलावा वर्द्धमान, वीर, सन्मति, अतिवीर आदि नामों से जाना जाता है जिसके पीछे कुछ औचित्य है। उनके जन्म से पूर्व ही कुंडलपुर के वैभव और सपन्नता दिन रात बढती रही जिससे उनके पिता राजा सिद्धार्थ ने उनका नाम वर्द्धमान रखा। एक बार जब सुमेरू पर्वत पर इन्द्रदेव उनका जलाभिषेक कर रहे थे। बालक बह न जाए इस बात से भयभीत होकर अभिषेक रूकवा दिया। इन्द्र के मन की बात भांप कर सुमेरू पर्वत को दबाकर कंपायमान कर दिया यह देखकर देवराज इन्द्र ने उनकी शक्ति का अनुमान लगाकर उन्हें वीर के नाम से जाने जाना लगा । बचपन में जब वह अपने राजमहल के आंगन में खेलते समय आकाशमार्ग से संजयमूनि और विजय मूनि सत्य और असत्य क्या है, उसका तोड निकाल रहे थे उसी समय पृथ्वी पर खेल रहे एक अद्भुत बालक को देखकर सत्य के साक्षात् दर्शन कर अपनी जिज्ञासा शांत की उन दोनों मूनियों ने इसका नाम सन्मति दिया। एक बार जब वह अपने मित्रों के साथ खेल के दौरान एक फणधारी सांप दिखा। जिसे देखकर सभी साथी डर के कारण भाग छूटे लेकिन वही रूके रहे। उनके पराक्रम को देखकर सर्प उनके पास आया तो वें सापं फन पर बैठ गए। सर्प बने संगमदेव ने अपना असली रूप धारण किया वे उनकी परीक्षा लेने पहुचें, इसके बाद से उन्हें अतिवीर नाम दिया गया। हम पर हावी पश्चिमी सभ्यता-आधुनिकता की दौड में हम भारतीय सभ्यता एव संस्कृति को हाशियें पर रखने लगे है। पश्चिमी संस्कृति इतनी हावी हो रही है कि आज हम जब अपना जन्मदिन मनाते है तो मोमबत्ती बुझाते है। लेकिन हमें भी अपना जन्मदिन दीप जलाकर मनाना चाहिए। जिसने देश को अंधकार से दुर ज्योति जलाने का काम किया है। आज हम उसी अंधकार में बढ रहे है। हमें इस अलौकिक महापुरूष, तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी के सिद्वान्तों पर सोचने की, अपने जीवन में उतारने की जरूरत है। अंत में यह कहना चाहता हू कि महावीर स्वामी ने अपने ज्ञानार्जन के द्वारा सत्य, अहिंसा की बात की है, वहीं देश और दुनिया को बचा सकती है। सरल एवं सच्ची राह पर चलने की बात, स्नेहपूर्वक, सादगीपूर्ण जीवन और आपसी सौहार्द्ध को हमें और मजबूत बनाने की जरूरत है। -सिद्धार्थ शाह
’’अहिंसा परमो धर्म ’’एक प्रिय संदेश महावीर स्वामी का जैन धर्म के अंतिम 24 वें तीर्थकर भगवान महावीर स्वामी की आज जन्म जयन्ति है। यह त्यौहार पूरे देश में बडे उत्साह एवं उल्लास के साथ मनाया जाता है। आज ही के दिन भारत की पावन मिट्टी पर अलौकिक महापुरूष का जन्म हुआ था। 2600 वर्ष बाद भी भगवान महावीर के संदेश, सिद्धान्त एवं आदर्श आज भी बहुत प्रासंगिक है। भगवान महावीर स्वामी का जन्म चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को बिहार राज्य के कुंडलपुर वैशाली में ईसा से 599 वर्ष पहले हुआ था। वर्तमान में यह स्थान बिहार के मुजफफरपुर जिले का बसाढगांव है। क्षत्रिय परिवार में पिता राजा सिद्धार्थ एवं माता त्रिशला से महावीर स्वामी का जन्म हुआ था, उनका बचपन का नाम वर्द्धमान था। वे एक राजपरिवार में जन्में थे। उनका बचपन राजमहल में बीता। घर में सुख सम्पदा, धन, ऐश्वर्य की कोई कमी नहीं थी। तीस वर्ष की उम्र में घर का त्याग कर दिया। सब कुछ छोडकर कष्टों की कठिन राह पर निकल पडे। कठिन तपस्या से उन्होंने अपने ज्ञान से विश्व को परिचय कराया कि महानताा भौतिक सुख सुविधाओं एवं पदार्थो से नहीं आती है। उसके लिए सत्य को अपनाना पडता है। नैतिकता की राह पर चल अंहिसा जीवन शैली से महानता प्राप्त की जा सकती है। बारह वर्ष की आराधना के बाद 30 वर्ष तक मानव समुदाय एवं प्राणी मात्र के कल्याण के लिए जीएं। उन्होंने तपस्या, साधना के द्वारा बहुत अनुभव प्रात किए। दुनिया को स्नेह का पाठ पढाया। अहिंसा की मूल शिक्षा से परिचय कराया। अहिंसा परमो धर्मए जीयो और जीनें दो के संदेश, पंच महाव्रत से दुनिया को परिचय कराया। देश और दुनिया में अहिंसा की ज्योति जलाने वाले भगवान को वीर, अतिवीर, सन्मति, वर्द्धमान एवं महावीर नाम से पुकारा जाता है। पांच नामों से पुकारे जाने के पीछे भी कुछ कारण है। भगवान महावीर स्वामी के अनुयायियों की कमी नहीं है। जैन हो या अजैन सभी श्रद्धा एवं आस्था से पूजते है। जैन धर्मावलम्बी इस त्यौहार पर धार्मिक आयोजन, जूलुस के साथ भगवान के संदेश प्रचारित करते है। जैन धर्मावलम्बी महावीर स्वामी की जयन्ति पर पंचामृत अभिषेक, जलाभिषेक, पूजन, सन्ध्याकालीन सांस्कृतिक कार्यक्रम, प्रभातफेरी, जुलूस के द्वारा बडे उत्साह से मनाते है। देश के ग्रामीण और शहरी क्षेत्र में तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी की शोभायात्रा, गंधकुटी में भगवान को विराजित कर निकालते है। भगवान की शोभायात्रा में नृत्य के साथ माहौल भक्तिमय बन जाता है। भगवान महावीर का जीयो और जीने दो का सिद्धान्त यही कहता है कि हम दूसरों से ऐसा व्यवहार करें जो हमें पसंद है एवं उनसे अपेक्षा रखते है। दुनिया को अपने उपदेशों के माध्यम से पंच महाव्रत बताएं। आत्मिक एवं शाश्वत सुख की प्राप्ति महावीर स्वामी के इन सिद्धान्तों से प्राप्त की जा सकती है। महावीर स्वामी ने अंहिंसा, सत्य, क्षमा, ब्रहमचर्य, अपरिग्रह, धर्म पर उपदेश दिए। देश के विभिन्न स्थानों पर महावीर स्वामी ने अपने संदेशों को फैलाया।महावीर स्वामी ने 72 वर्ष की आयु में पावापुरी में कार्तिक कृष्णा अमावस्या को निर्वाण प्राप्त किया। जरूरत अपनाने की-वर्तमान राजनीतिक एवं सामाजिक वातावरण में भगवान महावीर स्वामी के आदर्शो एवं सिद्धान्तों को जीवन में उतारने की जरूरत है। वर्तमान राजनीति में वैर भाव आ गया है। जो राजनीतिक एवं सामाजिकता के लिए ठिक नहीं है। महावीर स्वामी ने अपने आदर्शो से मानव से मानव को प्रेम करना सिखाया है। लेकिन वर्तमान राजनीति में न तो भाईचारा रह गया है। न हीं प्रेमभाव रह गया है रह गई है तो सिर्फ सकिर्ण मानसिकता। आज की राजनीति में एक दूसरे को बडा बताने के लिए कुछ भी बोल दिया जाता है। आज की राजनीति सभी को बांटने का काम कर रही है। जो देश के लिए एकता के लिए किसी भी हालात में ठीक नहीं है। उन्हेें महावीर स्वामी के आदर्शो को अपनाने की जरूरूत है। विश्व को पढाया अहिंसा का पाठ-भगवान महावीर की शिक्षा में मूलतः अहिंसा है। अहिंसा से भगवान महावीर स्वामी का गहरा रिश्ता जुड गया है, जो कभी अलग नहीं हो सकता है। सीधा सा अर्थ अहिंसा से यह लगाया जाता है कि किसी को अपने स्वार्थ के लिए दुःखी नहीं करना। पशु बली, पशुओं का वध, मांस भक्षण को तो हिंसा माना है लेकिन किसी के प्रति घृणा एवं बुरे विचार को हिंसा की श्रेणी में रखा है। ऐसी अंहिंसा किस काम की जिसमें प्रेम ना हो। सत्य और अहिंसा को जगत में रूबरू कराया। अहिंसा को जगत में प्रसिद्धि महावीर स्वामी ने दिलवायी। विद्यार्थियों को महावीर स्वामी के आदर्शो को आत्मसात् कर अपने जीवन में उतारना चाहिए। स्वाधीनता आंदोलन के समय में महात्मा गांधी ने जिस अंहिंसा को अपना सशक्त हथियार बनाया था। मानव जाति को अपनाने के लिए प्रेरित किया। उस अहिंसा परमो धर्म को महावीर स्वामी ने विश्व को बताया। यह अहिंसा महावीर का प्रिय संदेश है। महावीर स्वामी ने अपने उनदेशों से मानव समाज का कल्याण किया। सत्य का पालन करो, अहिंसा को अपनाओ, जीयो और जीने दो का उपदेश दिया उनका कहना है कि आज मानव ने अहिंसा को भुला दिया है। संसार में समस्त प्राणियों को अपना जीवन अति प्रिय है। जो नष्ट करने में तैयार रहता है वह हिंसक है। जो उसकी रक्षा में आगे आता है वहीं मानव है। पंच नाम के पीछे औचित्य-भगवान महावीर स्वामी को महावीर के अलावा वर्द्धमान, वीर, सन्मति, अतिवीर आदि नामों से जाना जाता है जिसके पीछे कुछ औचित्य है। उनके जन्म से पूर्व ही कुंडलपुर के वैभव और सपन्नता दिन रात बढती रही जिससे उनके पिता राजा सिद्धार्थ ने उनका नाम वर्द्धमान रखा। एक बार जब सुमेरू पर्वत पर इन्द्रदेव उनका जलाभिषेक कर रहे थे। बालक बह न जाए इस बात से भयभीत होकर अभिषेक रूकवा दिया। इन्द्र के मन की बात भांप कर सुमेरू पर्वत को दबाकर कंपायमान कर दिया यह देखकर देवराज इन्द्र ने उनकी शक्ति का अनुमान लगाकर उन्हें वीर के नाम से जाने जाना लगा । बचपन में जब वह अपने राजमहल के आंगन में खेलते समय आकाशमार्ग से संजयमूनि और विजय मूनि सत्य और असत्य क्या है, उसका तोड निकाल रहे थे उसी समय पृथ्वी पर खेल रहे एक अद्भुत बालक को देखकर सत्य के साक्षात् दर्शन कर अपनी जिज्ञासा शांत की उन दोनों मूनियों ने इसका नाम सन्मति दिया। एक बार जब वह अपने मित्रों के साथ खेल के दौरान एक फणधारी सांप दिखा। जिसे देखकर सभी साथी डर के कारण भाग छूटे लेकिन वही रूके रहे। उनके पराक्रम को देखकर सर्प उनके पास आया तो वें सापं फन पर बैठ गए। सर्प बने संगमदेव ने अपना असली रूप धारण किया वे उनकी परीक्षा लेने पहुचें, इसके बाद से उन्हें अतिवीर नाम दिया गया। हम पर हावी पश्चिमी सभ्यता-आधुनिकता की दौड में हम भारतीय सभ्यता एव संस्कृति को हाशियें पर रखने लगे है। पश्चिमी संस्कृति इतनी हावी हो रही है कि आज हम जब अपना जन्मदिन मनाते है तो मोमबत्ती बुझाते है। लेकिन हमें भी अपना जन्मदिन दीप जलाकर मनाना चाहिए। जिसने देश को अंधकार से दुर ज्योति जलाने का काम किया है। आज हम उसी अंधकार में बढ रहे है। हमें इस अलौकिक महापुरूष, तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी के सिद्वान्तों पर सोचने की, अपने जीवन में उतारने की जरूरत है। अंत में यह कहना चाहता हू कि महावीर स्वामी ने अपने ज्ञानार्जन के द्वारा सत्य, अहिंसा की बात की है, वहीं देश और दुनिया को बचा सकती है। सरल एवं सच्ची राह पर चलने की बात, स्नेहपूर्वक, सादगीपूर्ण जीवन और आपसी सौहार्द्ध को हमें और मजबूत बनाने की जरूरत है। -सिद्धार्थ शाह